यूथ इंडिया
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिविर के बाहर शनिवार शाम करीब 7 बजे अचानक हंगामे की स्थिति बन गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कुछ लोग लाठी-डंडों के साथ नारेबाजी करते हुए शिविर के बाहर पहुंचे। इस दौरान माहौल को तनावपूर्ण बनाने की कोशिश की गई और “आई लव बुलडोजर बाबा” जैसे नारे भी लगाए गए।
घटना ने न केवल धार्मिक मर्यादाओं पर सवाल खड़े किए, बल्कि इसे एक सुनियोजित राजनीतिक उकसावे के रूप में भी देखा जा रहा है।
यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के कई सामाजिक और धार्मिक वक्तव्यों के बाद से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुप्पी लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। इसके बावजूद, योगी और शंकराचार्य के बीच कथित टकराव को बार-बार राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जा रही है।
सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री की ओर से कोई सीधी प्रतिक्रिया या टकराव नहीं है, तो फिर यह आक्रामक माहौल किसके इशारे पर बनाया जा रहा है?
“आई लव बुलडोजर बाबा” जैसे नारे सिर्फ नारे नहीं हैं, बल्कि वे एक सियासी संदेश भी देते हैं। इन नारों के जरिए धार्मिक मंच को राजनीतिक अखाड़ा बनाने की कोशिश साफ नजर आती है। यह घटनाक्रम इस आशंका को और मजबूत करता है कि शंकराचार्य को लेकर जानबूझकर एक विवादित नैरेटिव गढ़ा जा रहा है।
शंकराचार्य का पद भारतीय सनातन परंपरा में सर्वोच्च आध्यात्मिक सम्मान का प्रतीक है। ऐसे में उनके शिविर के बाहर लाठी-डंडों के साथ नारेबाजी होना न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह धार्मिक गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला भी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है, जिसका उद्देश्य—धार्मिक नेतृत्व को विवादों में घसीटना,सत्ता और संत समाज के बीच कृत्रिम टकराव खड़ा करना और सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना शहर की शांति पर सवाल खड़े करता है।इस घटना ने शहर की कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि धार्मिक शिविरों के बाहर इस तरह का प्रदर्शन सामान्य होने लगे, तो यह समाज के लिए खतरनाक संकेत है।
यह मुद्दा योगी बनाम शंकराचार्य का नहीं दिखता, बल्कि यह उस राजनीतिक मानसिकता का परिणाम प्रतीत होता है, जो हर धार्मिक मंच को सत्ता संघर्ष का मैदान बनाना चाहती है।
शंकराचार्य की चुप्पी या मुख्यमंत्री की चुप्पी—दोनों के बीच जिस तरह से टकराव का भ्रम पैदा किया जा रहा है, वह स्वतःस्फूर्त नहीं, बल्कि प्रायोजित लगता है।

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