चुनावी प्रक्रिया और पारदर्शिता की अनिवार्यता
यूथ इंडिया
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी होते हैं। ऐसे में यह सवाल बार-बार उठता है कि जब बैंक खाते, पैन कार्ड, मोबाइल नंबर, राशन कार्ड और सरकारी योजनाएं आधार से जुड़ सकती हैं, तो वोटर आईडी को आधार से लिंक करने पर इतना विरोध क्यों?
यह प्रश्न केवल तकनीकी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता से सीधा जुड़ा हुआ है।
भारत की चुनावी व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है—
एक व्यक्ति के नाम पर कई स्थानों पर वोट,मृत व्यक्तियों के नाम पर मतदाता सूची में प्रविष्टियां,स्थान परिवर्तन के बाद भी नाम न हटना,इन समस्याओं के कारण चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे हैं। यदि वोटर आईडी को आधार से जोड़ा जाए, तो एक व्यक्ति—एक वोट की अवधारणा को मजबूती मिल सकती है और फर्जी मतदान की संभावनाएं लगभग समाप्त हो सकती हैं।
विरोध की असली वजह क्या है?
आधार लिंकिंग के विरोध में अक्सर निजता (प्राइवेसी) का तर्क दिया जाता है। लेकिन यह तर्क तब कमजोर पड़ जाता है जब वही नागरिक अपने बैंक, मोबाइल, आयकर और सरकारी लाभ के लिए आधार का उपयोग कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आधार-वोट लिंकिंग का विरोध दरअसल उन ताकतों को असहज करता है, जिनकी राजनीति अस्पष्ट मतदाता सूची, फर्जी वोट और वोट बैंक प्रबंधन पर टिकी रही है।
यदि चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और तकनीक-आधारित हो जाए—तो फर्जी मतदाता समाप्त होंगे तो चुनाव परिणामों पर अविश्वास कम होगा तो लोकतंत्र और मजबूत होगा ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि पारदर्शिता से डर किसे है?
भारत निर्वाचन आयोग समय-समय पर मतदाता सूची की शुद्धता पर जोर देता रहा है। आधार से लिंकिंग कोई बाध्यता नहीं, बल्कि एक सफाई अभियान हो सकता है, जिससे वास्तविक मतदाता को उसका अधिकार और फर्जी व्यवस्था को समाप्त किया जा सके।
लोकतंत्र स्थिर नहीं होता, उसे समय के साथ सुधारों की आवश्यकता होती है। जैसे ईवीएम, वीवीपैट और ऑनलाइन नामांकन ने चुनावी प्रक्रिया को बेहतर बनाया, वैसे ही आधार-वोट लिंकिंग भी एक स्वाभाविक अगला कदम हो सकता है—बशर्ते इसके लिए स्पष्ट कानून, मजबूत डेटा सुरक्षा और पारदर्शी प्रणाली सुनिश्चित की जाए।
सवाल यह नहीं है कि आधार से वोट क्यों जोड़ा जाए,
सवाल यह है कि आखिर किसे डर है कि वोट आधार से जुड़ जाएगा?
यदि उद्देश्य लोकतंत्र को मजबूत करना है, तो पारदर्शिता से पीछे हटना लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ समझौता होगा।स्वच्छ मतदाता सूची, निष्पक्ष चुनाव और जनता का विश्वास—यही किसी भी सशक्त लोकतंत्र की असली पहचान है।


