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Sunday, January 25, 2026

परीक्षा से आगे सोचना होगा: शिक्षा का असली मकसद

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डॉ विजय गर्ग

आज के दौर में ‘शिक्षा’ और ‘परीक्षा’ एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। जैसे ही बच्चा स्कूल में कदम रखता है, उसके सीखने की यात्रा अंकों और ग्रेड्स की दौड़ में बदल जाती है। लेकिन क्या जीवन की सफलता केवल उत्तर पुस्तिकाओं में लिखे गए शब्दों तक सीमित है? समय आ गया है कि हम परीक्षा से आगे सोचना शुरू करें।

1. अंकों के जाल से बाहर निकलना

अक्सर यह माना जाता है कि जिसके पास 95% अंक हैं, वह सबसे बुद्धिमान है। लेकिन वास्तविकता यह है कि परीक्षा केवल आपकी याददाश्त का परीक्षण करती है, आपकी योग्यता का नहीं।

अंक: केवल एक विशेष दिन के प्रदर्शन को दर्शाते हैं।

कौशल : यह निर्धारित करते हैं कि आप वास्तविक जीवन की समस्याओं को कैसे सुलझाते हैं।

2. रटने की संस्कृति बनाम गहरी समझ

हमारी वर्तमान व्यवस्था ‘रट्टा मार’ पद्धति पर टिकी है। छात्र साल भर केवल इसलिए पढ़ते हैं ताकि वे परीक्षा के तीन घंटों में सब कुछ उगल सकें।

परीक्षा से आगे: हमें ‘क्या’ के बजाय ‘क्यों’ और ‘कैसे’ पर ध्यान केंद्रित करना होगा। जब तक छात्र विषय की गहराई को नहीं समझेंगे, वह ज्ञान उनके जीवन में काम नहीं आएगा।

3. भविष्य के कौशल

आने वाला समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीकी बदलावों का है। यहाँ केवल डिग्री काम नहीं आएगी। छात्रों को निम्नलिखित कौशलों को विकसित करने की जरूरत है:

तार्किक सोच : सही और गलत के बीच फर्क करना।

भावनात्मक बुद्धिमत्ता : तनाव और रिश्तों को प्रबंधित करना।

अनुकूलन क्षमता : बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना।

4. असफलता का डर और मानसिक स्वास्थ्य

परीक्षा के अत्यधिक दबाव के कारण युवाओं में तनाव और अवसाद बढ़ रहा है। हमें यह समझना होगा कि एक परीक्षा पत्र का टुकड़ा किसी का भविष्य तय नहीं कर सकता। महान वैज्ञानिक थॉमस एडिसन और अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जिन्होंने स्कूल की परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया, लेकिन दुनिया बदल दी।

परीक्षा ज्ञान को परखने का एक तरीका हो सकती है, लेकिन यह ज्ञान का सम्पूर्ण मूल्यांकन नहीं है। रटकर उत्तर लिख देने वाला छात्र अच्छे अंक ला सकता है, पर क्या वह जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान कर पाएगा? आज का समाज ऐसे युवाओं की मांग करता है जो सोच सकें, सवाल कर सकें, नए रास्ते खोज सकें और बदलाव के साथ खुद को ढाल सकें।

परीक्षा-केंद्रित सोच का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे सीखने की जिज्ञासा खत्म होने लगती है। छात्र यह नहीं पूछता कि “यह क्यों है?”, बल्कि यह सोचता है कि “परीक्षा में आएगा या नहीं?” नतीजा यह होता है कि विषय बोझ बन जाता है और सीखना दबाव।

हमें यह समझना होगा कि शिक्षा का असली मकसद व्यक्तित्व निर्माण है—सिर्फ नौकरी पाना नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनना। जीवन में सफल वही होता है जिसमें संवाद कौशल हो, नैतिक मूल्य हों, भावनात्मक समझ हो और असफलताओं से उबरने की ताकत हो। ये गुण किसी प्रश्नपत्र में नहीं मापे जा सकते।

इस बदलाव में शिक्षकों और अभिभावकों की भूमिका बेहद अहम है। बच्चों की तुलना अंकों से नहीं, उनकी रुचि, मेहनत और प्रगति से की जानी चाहिए। उन्हें यह भरोसा दिया जाना चाहिए कि परीक्षा असफल होना जीवन में असफल होना नहीं है। खेल, कला, लेखन, नवाचार और सामाजिक कार्यों को भी उतनी ही अहमियत मिलनी चाहिए जितनी गणित या विज्ञान को।

नई शिक्षा नीति इसी दिशा में एक संकेत देती है, जहाँ कौशल, अनुभवात्मक सीख और बहुविषयक शिक्षा पर ज़ोर है। लेकिन नीतियों से ज़्यादा ज़रूरी है हमारी सोच का बदलना।

अंततः परीक्षा एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं। अगर हम बच्चों को सिर्फ परीक्षा के लिए तैयार करेंगे, तो वे सवालों से डरेंगे। लेकिन अगर हम उन्हें जीवन के लिए तैयार करेंगे, तो वे हर चुनौती को अवसर में बदल देंगे। इसलिए ज़रूरत है—परीक्षा से आगे सोचने की।

शिक्षा का अंतिम उद्देश्य एक अच्छी नौकरी पाना मात्र नहीं, बल्कि एक सजग और विचारशील इंसान बनना है। जब हम परीक्षाओं के दायरे से बाहर निकलकर जिज्ञासा, रचनात्मकता और मानवता को महत्व देंगे, तभी देश का वास्तविक विकास संभव होगा।

डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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