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Sunday, January 25, 2026

परिवारवाद की राजनीति और लोकतंत्र की कसौटी

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शरद कटियार

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता, जनभागीदारी और नेतृत्व के लिए खुले अवसर रहे हैं। लेकिन इसी लोकतांत्रिक ढांचे में परिवारवाद की राजनीति लंबे समय से एक गंभीर चुनौती बनकर सामने खड़ी है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह का यह कथन कि “परिवारवादी पार्टियां देश और उत्तर प्रदेश का कल्याण नहीं कर सकतीं” केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आत्ममंथन का आह्वान है।

परिवारवादी राजनीति का मूल चरित्र सत्ता को सेवा का माध्यम नहीं, बल्कि निजी विरासत मानने की मानसिकता से उपजा है। लोकतंत्र में जहां नेतृत्व संघर्ष, योग्यता और जनसमर्थन से उभरना चाहिए, वहीं परिवारवाद में पद और प्रभाव उपनाम और संबंधों के आधार पर तय होते हैं। इससे न केवल प्रतिभाशाली कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है, बल्कि संगठन और शासन दोनों में जड़ता आ जाती है।

उत्तर प्रदेश का राजनीतिक अनुभव

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और सामाजिक रूप से संवेदनशील राज्य ने परिवारवादी राजनीति के दुष्परिणामों को प्रत्यक्ष रूप से देखा है। दशकों तक सत्ता परिवर्तन के बावजूद आम जनता के मूल प्रश्न—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा—प्राथमिकता नहीं बन सके। सत्ता के केंद्र में सीमित परिवार और उनके करीबी रहे, जबकि प्रशासनिक व्यवस्था राजनीतिक संरक्षण के बोझ तले दबती चली गई।

परिवारवाद केवल सत्ता संरचना तक सीमित नहीं रहता, उसका सीधा प्रभाव कानून-व्यवस्था और प्रशासन पर भी पड़ता है। जब निर्णय लेने की प्रक्रिया पारदर्शिता की बजाय निजी हितों से संचालित होती है, तब अपराध, भ्रष्टाचार और पक्षपात को बढ़ावा मिलता है। यही कारण है कि ऐसे दौर में जनता का शासन व्यवस्था से भरोसा कमजोर होता है।

विकास की राजनीति का उभार

पिछले कुछ वर्षों में देश और उत्तर प्रदेश में राजनीति की दिशा में एक स्पष्ट परिवर्तन देखा गया है। विकास, सुशासन, बुनियादी ढांचे और सुरक्षा को केंद्र में रखकर की जा रही राजनीति ने परिवारवाद के विकल्प के रूप में स्वयं को स्थापित किया है। यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि जनता अब नारे नहीं, परिणाम देखना चाहती है।

लोकतंत्र में जनता की भूमिका

लोकतंत्र का असली प्रहरी मतदाता होता है। जब जनता भावनात्मक अपील, जातीय समीकरण या पारिवारिक नामों से ऊपर उठकर नीति, नीयत और कार्यों के आधार पर निर्णय लेती है, तभी लोकतंत्र सशक्त बनता है। परिवारवाद को समाप्त करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी अंततः मतदाता की जागरूकता पर ही निर्भर करती है।

आज आवश्यकता है ऐसी राजनीति की, जहां नेतृत्व अवसर का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का प्रतीक हो; जहां सत्ता व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास की अभिव्यक्ति बने। परिवारवाद से मुक्त राजनीति ही देश और उत्तर प्रदेश को स्थायी विकास, सामाजिक संतुलन और मजबूत लोकतंत्र की दिशा में आगे ले जा सकती है।

अमित शाह का यह बयान इसी व्यापक विमर्श की ओर संकेत करता है कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए राजनीति को विरासत नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम बनाना होगा।

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