(डॉ. सुधाकर आशावादी -विनायक फीचर्स)
विश्व भर में विशिष्ट कौशल के आधार पर प्रतिभाशाली छात्र छात्राओं को कड़ी प्रतिस्पर्द्धा से गुजरना पड़ रहा है। ऐसे में भेदभाव पूर्ण शिक्षा नीति के चलते प्रतिभाशाली छात्रों को योग्य होते हुए भी शैक्षिक अधिकारों से वंचित होने के कारण शिक्षा एवं रोजगार के लिए विदेशी विश्व विद्यालयों के माध्यम से महंगी शिक्षा के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। विश्व विद्यालय अनुदान आयोग इस पलायन को रोकने के लिए कोई नियमावली तो नहीं बनाता, वरन उच्च शिक्षा में जातीय विभेद को बढ़ावा देकर समाज के प्रतिभाशाली छात्रों को जातीय आतंक में धकेल कर शिक्षा का विषाक्त वातावरण बनाने पर तुला है।
यदि ऐसा न होता, तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना ) विनियम 2026 को दिनांक 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित न किया जाता तथा इस विनियम को 2012 से लागू भेदभाव रोधी नियमों का अद्यतन रूप न बताया जाता। नई नियमावली में उच्च शिक्षण संस्थानों में समान अवसर केंद्र स्थापित करने का प्रावधान किया गया है, जिसका उद्देश्य सभी वर्गों के लिए समान अवसर और समावेशन सुनिश्चित करना है। समान अवसर केंद्र के अंतर्गत समिति का गठन संस्थान प्रमुख की अध्यक्षता में किया जाएगा तथा समिति सदस्यों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग , दिव्यांग तथा महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा। इस विनियम में पहले केवल अनुसूचित जाति, जनजाति को जातिगत भेदभाव के दायरे में रखा गया था, अंतिम अधिसूचित नियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग को जाति आधारित भेदभाव के दायरे में शामिल किया गया है साथ झूठी शिकायत पाए जाने पर भी झूठे आरोप लगाने वाले को दोषी ठहराए जाने का प्रावधान नहीं है। यदि इस नियमावली का विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होगा, कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का यह प्रावधान समाज में भेदभाव को कम करने वाला न होकर भेदभाव को बढ़ावा देने वाले जातीय आधार पर विभाजन की लम्बी लकीर खींचने वाला तथा अनारक्षित वर्ग की जातियों के छात्रों के उत्पीड़न का आधार बनेगा, जिससे देश में बची खुची अनारक्षित प्रतिभाएं भी उच्च शिक्षा संस्थानों से मुंह फेरने हेतु बाध्य होगी।
विडंबना है कि एक ओर तो देश की एकता व अखंडता को बनाए रखने के लिए स्वदेशी, नागरिक कर्तव्य,पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से जोड़ने की बात की जाती है, दूसरी ओर उच्च शिक्षा संस्थानों में जातीय आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देने वाले प्रावधान लागू करने में संकोच नहीं किया जाता। विश्व के किसी भी कोने में शिक्षा में अनुशासन बनाए रखने के लिए इस प्रकार के भेदभाव पूर्ण प्रावधान दृष्टिगत नहीं होते, जहाँ ख़ास जातियों के छात्रों को समाज के एक वर्ग के विरुद्ध शिकायतें करके किसी भी प्रकार से दण्डित कराए जाने की व्यवस्था हो। बहरहाल यह चिंताजनक स्थिति है, जो उच्च शिक्षा की गुणवत्ता की अवहेलना करके जातिवादी वैमनस्य को बढ़ावा देने के लिए लागू की गई है।
सर्वविदित है कि प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक सभी संस्थानों में अनुशासन समिति प्रतिवर्ष बनाई जाती है, जिसका कार्य ही शिक्षण संस्थानों में अराजक तत्वों, जातीय आधार पर भेदभाव की शिकायतों का निस्तारण करना होता है। ऐसी स्थिति में जातीय संकीर्णता को बढ़ावा देते हुए जातिगत पूर्वाग्रह के आधार पर आरक्षित वर्ग के छात्रों को अनारक्षित वर्ग के विरुद्ध शिकायतें करने की खुली छूट प्रदान करना क्या शिक्षा व्यवस्था में वैमनस्य और विघटनकारी गतिविधियों को प्रोत्साहन देना नहीं है ?
विचारणीय यही है कि वैश्विक परिवेश में जब संकीर्ण जातीयता दम तोड़ रही है, ऐसे में कुछ विशेष जातियों को पीड़ित दर्शाकर तथा ख़ास जातियों को उत्पीड़क दर्शाकर अविवेकपूर्ण प्रावधानों के औचित्य पर ही प्रश्न खड़े होते हैं। ऐसे में प्रश्न यह भी है, कि अंग्रेज शासकों की नीति फूट डालो राज करो, के अनुसार धार्मिक आधार पर समाज का बंटवारा किया गया, क्या उसी प्रकार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग संकीर्ण जातीय सियासत करने वाले तत्वों की तरह जातियों में फूट डालकर समाज को टुकड़ों में बांटकर जातिगत वैमनस्य को बढ़ावा देने का प्रयास तो नहीं कर रहा ? (विनायक फीचर्स)





