जब यह कहा जाता है कि शंकराचार्य का प्रोटोकॉल होता है, तो इसे आस्था या भावुकता मानकर टाल देना एक बड़ी भूल होगी। वास्तव में भारत की सभ्यता में दो प्रकार के प्रोटोकॉल समानांतर रूप से चलते आए हैं—
एक राज्य-संवैधानिक, दूसरा धार्मिक-सभ्यतागत।
शंकराचार्य का प्रोटोकॉल इसी दूसरी श्रेणी में आता है।
संवैधानिक प्रोटोकॉल क्या है
संवैधानिक प्रोटोकॉल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, न्यायाधीश जैसे पदों के लिए तय होता है।
यह प्रोटोकॉल पद की गरिमा,व्यवस्था, प्रशासनिक अनुशासन को बनाए रखने के लिए होता है।
यह व्यक्ति से नहीं, पद से जुड़ा होता है आज कोई है, कल कोई और होगा, लेकिन प्रोटोकॉल बना रहेगा।शंकराचार्य प्रोटोकॉल भी पद-आधारित है ठीक यही सिद्धांत शंकराचार्य पद पर भी लागू होता है। शंकराचार्य कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित सर्वोच्च वैदिक पद है। इसलिए उनका प्रोटोकॉल भी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं बल्कि शंकराचार्य पद की गरिमा के लिए होता है। यह प्रोटोकॉल संविधान से नहीं, बल्कि सनातन परंपरा और शास्त्रीय मर्यादा से निकलता है। दोनों प्रोटोकॉल में समानताएँ यदि निष्पक्ष तुलना की जाए, तो दोनों में स्पष्ट समानताएँ दिखती हैं
शंकराचार्य प्रोटोकॉल पद सर्वोच्च, व्यक्ति गौण पद सर्वोच्च, व्यक्ति गौण विशेष आसन/व्यवस्था विशेष आसन/सिंहासन सुरक्षा व अनुशासन शांति, सुरक्षा व मर्यादा संबोधन की तय शैली जगद्गुरु, पूज्यपाद जैसे संबोधन अपमान = पद का अपमान अपमान = परंपरा का अपमान अंतर केवल इतना है कि एक राज्य की सत्ता का प्रतिनिधित्व करता है, दूसरा धर्म की सत्ता का।
भारत के इतिहास में राजसत्ता और धर्मसत्ता टकराती नहीं थीं, बल्कि पूरक थीं।राजा राज्य चलाता था, शंकराचार्य धर्म की दिशा तय करते थे।
इसीलिए राजाओं के दरबार में शंकराचार्य को—छत्र,सर्वोच्च आसन सम्मानजनक संबोधन दिया जाता था। यह किसी व्यक्ति को बड़ा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि धर्म की सर्वोच्चता स्वीकार करने के लिए था।
आज टकराव क्यों दिखता है
आधुनिक प्रशासन अक्सर शंकराचार्य प्रोटोकॉल को “अनौपचारिक” समझ लेता है, जबकि वह सभ्यतागत रूप से उतना ही अनिवार्य है जितना संवैधानिक प्रोटोकॉल।
यहीं से असंवेदनशीलता पैदा होती है, और वही घटनाएँ जन्म लेती हैं जो समाज को आहत करती हैं।
संवैधानिक प्रोटोकॉल राज्य को अनुशासित रखता है,और शंकराचार्य प्रोटोकॉल समाज की आत्मा को।
इन दोनों में प्रतिस्पर्धा नहीं, संतुलन होना चाहिए।जिस दिन राज्य यह समझ लेगा कि शंकराचार्य का प्रोटोकॉल किसी व्यक्ति की मांग नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता की आवश्यकता है, उसी दिन ऐसे टकराव स्वतः समाप्त हो जाएंगे।






