राघवेंद्र सिंह
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। यहाँ की आबादी का एक बड़ा हिस्सा 35 वर्ष से कम आयु का है। यह आँकड़ा केवल जनसंख्या का नहीं, बल्कि संभावनाओं का संकेत है। यही युवा वर्ग देश की सबसे बड़ी ताक़त भी है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी। युवा केवल उम्र का नाम नहीं है, युवा एक विचार है—जो सवाल करता है, असहमति जताता है, नई राह खोजता है और भविष्य को आकार देता है।
आज का युवा पहले से कहीं अधिक जागरूक है। वह केवल नौकरी, पद या वेतन तक सीमित सपने नहीं देखता, बल्कि सम्मान, पहचान और उद्देश्य की तलाश में है। सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और तकनीक ने उसे अपनी बात कहने का अवसर दिया है। अब वह अन्याय, भ्रष्टाचार, भेदभाव और असमानता को चुपचाप स्वीकार नहीं करता। वह सवाल पूछता है—कभी सड़क पर, कभी क़लम से और कभी स्क्रीन के ज़रिये।
लेकिन इस जागरूकता के समानांतर एक कड़वी सच्चाई भी मौजूद है। यही युवा आज बेरोज़गारी, मानसिक दबाव, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता और सामाजिक अपेक्षाओं के भारी बोझ से जूझ रहा है। वर्षों की पढ़ाई, कठिन परिश्रम और सपनों के बाद भी जब स्थिरता नहीं मिलती, तो सपनों और हकीकत के बीच की दूरी उसे भीतर से तोड़ने लगती है। यह हताशा केवल व्यक्तिगत नहीं होती, यह पूरे समाज की चिंता बन जाती है।
ऐसे समय में सबसे बड़ी ज़रूरत है—सही दिशा और सही मार्गदर्शन। युवा ऊर्जा यदि दिशाहीन हो जाए, तो वह कुंठा और आक्रोश में बदल सकती है। लेकिन यदि उसे अवसर, भरोसा और मंच मिले, तो वही ऊर्जा राष्ट्र निर्माण की नींव बन जाती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि हर बड़े सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक परिवर्तन की शुरुआत युवाओं ने ही की है।
युवा जब केवल विरोध तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाधान का हिस्सा बनता है—तभी वास्तविक बदलाव संभव होता है। शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार हो या सामाजिक सेवा में भागीदारी, राजनीति में वैचारिक हस्तक्षेप हो या पत्रकारिता में सच की खोज—हर क्षेत्र में युवा नेतृत्व नई ऊर्जा भरता है। स्टार्टअप संस्कृति, सामाजिक उद्यमिता और स्वयंसेवी आंदोलनों में युवाओं की बढ़ती भूमिका यह साबित करती है कि आज का युवा केवल शिकायत नहीं करता, बल्कि विकल्प भी गढ़ रहा है।
आज ज़रूरत है कि युवा अपनी ताक़त को पहचाने। भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि विवेक और समझदारी से निर्णय ले। नकारात्मकता, नफ़रत और हताशा से ऊपर उठकर रचनात्मक भूमिका निभाए। सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने से आगे बढ़कर ज़मीन पर सकारात्मक बदलाव लाने का साहस दिखाए।
युवा शक्ति यदि सही दिशा में प्रवाहित हो, तो वह भारत को केवल आर्थिक रूप से विकसित नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण और नैतिक रूप से संवेदनशील राष्ट्र बना सकती है। यह पीढ़ी यदि अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी समझ ले, तो आने वाला समय केवल उज्ज्वल ही नहीं, बल्कि स्थायी रूप से सशक्त होगा।अंततः, भारत का भविष्य किसी नीति-पत्र या घोषणा में नहीं, बल्कि उसके युवाओं की सोच, संकल्प और कर्म में छिपा है। जब युवा जागता है, तब राष्ट्र आगे बढ़ता है।

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