प्रशांत कटियार

समाज में भ्रष्टाचार अब सिर्फ़ एक अपराध नहीं, बल्कि एक ऐसी मानसिकता बन चुका है, जो सबसे कमजोर व्यक्ति को सबसे पहले कुचलती है। जब व्यवस्था की ताकत कुर्सी पर बैठा व्यक्ति अपनी शक्ति का इस्तेमाल जरूरतमंद को दबाने में करता है, तब सवाल सिर्फ़ कानून का नहीं, इंसानियत के अस्तित्व का होता है।
80,000 रुपया मासिक वेतन पाने वाला सरकारी कर्मचारी जब रोज 300 रुपया कमाने वाले मजदूर से रिश्वत की मांग करता है, तो वह केवल नियम नहीं तोड़ता, बल्कि नैतिकता की हत्या करता है। यह वह क्षण होता है, जब सरकारी सेवा का अर्थ खत्म हो जाता है और कुर्सी पर बैठा व्यक्ति सेवा नहीं, शोषण का प्रतीक बन जाता है।
जिस मजदूर का पूरा जीवन मेहनत, पसीने और संघर्ष में गुजरता है, उसके लिए सरकारी दफ्तर आख़िरी उम्मीद होता है। लेकिन जब उसी दफ्तर में उससे पैसे मांगे जाते हैं, तो कानून नहीं, भरोसा टूटता है। यह भरोसा उस व्यवस्था से होता है, जिसे समाज ने न्याय और सुरक्षा की जिम्मेदारी दी है।भ्रष्टाचार का सबसे खतरनाक रूप यही है कि यह गरीब की मजबूरी को हथियार बनाता है। अमीर के लिए रिश्वत सौदा हो सकती है, लेकिन गरीब के लिए यह अपमान, लाचारी और अन्याय का दूसरा नाम है। ऐसे में वर्दी, पद और अधिकार सिर्फ दिखावा बनकर रह जाते हैं।यह सच भी उतना ही कड़वा है कि पद बड़ा होने से चरित्र बड़ा नहीं हो जाता। जब चरित्र छोटा पड़ जाता है, तो सम्मान शून्य हो जाता है। समाज ऐसे लोगों को अफसर कह सकता है, लेकिन इतिहास उन्हें शोषक के नाम से ही याद रखता है।आज जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार को केवल कानूनी अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक कलंक माना जाए। जब तक रिश्वत को “चलता है” कहकर नजरअंदाज़ किया जाता रहेगा, तब तक सबसे कमजोर व्यक्ति ही इसकी कीमत चुकाता रहेगा।
सच कड़वा जरूर है, लेकिन यही सच समाज को आईना दिखाता है। अगर इस आईने में हमें अपना चेहरा अच्छा नहीं लग रहा, तो दोष आईने का नहीं, हमारी सोच और हमारी व्यवस्था का है।

लेखक दैनिक यूथ इंडिया के स्टेट हेड है।

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