प्रभात यादव
शिक्षा को किसी भी समाज की रीढ़ माना जाता है। यही शिक्षा व्यक्ति को सोचने, समझने और आगे बढ़ने की क्षमता देती है। लेकिन आज भारत में शिक्षा का स्वरूप धीरे-धीरे सेवा से व्यापार में बदलता जा रहा है। स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों की बढ़ती फीस ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शिक्षा अब केवल उन्हीं के लिए रह गई है, जिनकी जेब भारी है?
एक समय था जब शिक्षा को सामाजिक दायित्व माना जाता था। आज निजी स्कूल, विश्वविद्यालय और कोचिंग संस्थान इसे लाभ का साधन बना चुके हैं। नामी स्कूलों की सालाना फीस, किताबों का अलग खर्च, यूनिफॉर्म, ट्रांसपोर्ट, एक्टिविटी चार्ज और कोचिंग की मोटी रकम—ये सब मिलकर मध्यम और गरीब परिवारों की कमर तोड़ रहे हैं।
असमानता को बढ़ाती महंगी शिक्षा
महंगी शिक्षा ने समाज में एक गहरी खाई पैदा कर दी है। एक तरफ वह वर्ग है जो बेहतरीन स्कूल, विदेशों की पढ़ाई और महंगी कोचिंग हासिल कर रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रतिभाशाली लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर छात्र सिर्फ इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि वे फीस नहीं भर सकते।
इससे प्रतिभा नहीं, पैसा योग्यता का पैमाना बनता जा रहा है।
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी अब कोचिंग के बिना अधूरी मानी जाने लगी है। लाखों रुपये की फीस लेकर चलने वाली कोचिंग संस्थाएं छात्रों और अभिभावकों पर मानसिक और आर्थिक दबाव बनाती हैं। कई बार यह दबाव इतना बढ़ जाता है कि छात्र अवसाद और आत्महत्या जैसे खतरनाक रास्तों की ओर बढ़ जाते हैं।
महंगी निजी शिक्षा के बढ़ते प्रभाव के बीच सरकारी स्कूल और कॉलेज लगातार उपेक्षित होते जा रहे हैं। यदि सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जाए, तो शिक्षा पर बढ़ता खर्च अपने आप कम हो सकता है। लेकिन दुर्भाग्य से नीति और निवेश दोनों स्तरों पर गंभीरता की कमी दिखती है।
आज कई परिवार बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लेने को मजबूर हैं। माता-पिता अपनी आवश्यकताएँ छोड़कर फीस भरते हैं, फिर भी उन्हें यह चिंता सताती रहती है कि इतनी महंगी शिक्षा के बाद भी रोजगार मिलेगा या नहीं। यह स्थिति शिक्षा को अवसर नहीं, बल्कि आर्थिक बोझ बना रही है।
शिक्षा को सुलभ और समान बनाने के लिए आवश्यक है कि,
निजी संस्थानों की फीस पर सख्त नियमन हो,
सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता सुधारी जाए,
छात्रवृत्ति और आर्थिक सहायता योजनाओं का विस्तार हो,
शिक्षा को मौलिक अधिकार की भावना के साथ लागू किया जाए।
शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि नागरिक तैयार करना है। यदि शिक्षा केवल अमीरों की बपौती बन गई, तो समाज का संतुलन बिगड़ जाएगा।
अब समय आ गया है कि शिक्षा को फिर से सेवा और अधिकार के रूप में देखा जाए, न कि केवल व्यापार के रूप में।
क्योंकि जिस समाज में शिक्षा महंगी और सीमित हो जाती है, वहाँ सपने सबसे पहले टूटते हैं।






