भरत चतुर्वेदी
इस संसार में धन, संपत्ति, पद और वैभव को सफलता का पैमाना माना जाता है। लोग पूरी ज़िंदगी इन्हें पाने की दौड़ में लगा देते हैं। लेकिन जब जीवन की गहराई में उतरकर देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि वास्तविक समृद्धि धन से नहीं, बल्कि प्रेम और सम्मान से आती है। पैसा व्यक्ति को सुविधा दे सकता है, सुरक्षा दे सकता है, पर वह दिल का सुकून, आत्मिक शांति और रिश्तों की गर्माहट नहीं दे सकता।
प्रेम वह भावना है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। यह न भाषा देखती है, न वर्ग, न ही पद और प्रतिष्ठा। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ कठोरता पिघल जाती है, टूटे रिश्ते जुड़ने लगते हैं और मन का बोझ हल्का हो जाता है। वहीं सम्मान व्यक्ति के आत्मसम्मान को जीवित रखता है। सम्मान के बिना दिया गया प्रेम भी अधूरा होता है, क्योंकि सम्मान ही वह आधार है जिस पर विश्वास और स्थायित्व टिका होता है।
आज का समाज भौतिक उपलब्धियों पर अधिक केंद्रित हो गया है। लोग यह भूलते जा रहे हैं कि रिश्ते लेन-देन से नहीं, भावना से चलते हैं। अक्सर देखा जाता है कि अपनों के बीच भी संवाद की जगह अहंकार ने ले ली है। ऐसी स्थिति में प्रेम और सम्मान का अभाव रिश्तों को खोखला बना देता है, चाहे घर कितना भी समृद्ध क्यों न हो।
जो व्यक्ति प्रेम और सम्मान देना जानता है, वह वास्तव में सबसे बड़ा दानी होता है। यह ऐसा धन है जिसे देने के लिए तिजोरी की जरूरत नहीं होती, न ही बैंक बैलेंस की। यह धन जितना बाँटा जाए, उतना ही बढ़ता है। प्रेम और सम्मान पाने की लालसा में जीने वाला व्यक्ति अक्सर खाली रह जाता है, लेकिन इन्हें देने वाला व्यक्ति भीतर से सदैव समृद्ध रहता है।
आज के तनावपूर्ण, प्रतिस्पर्धात्मक और भागदौड़ भरे जीवन में मनुष्य सबसे ज्यादा जिस चीज़ से जूझ रहा है, वह है भावनात्मक खालीपन। इस खालीपन को कोई भी भौतिक वस्तु नहीं भर सकती। यदि परिवार, समाज और कार्यस्थल पर प्रेम और सम्मान का वातावरण बने, तो अवसाद, हिंसा और असंतोष जैसी समस्याएँ स्वतः कम हो जाएँ।
प्रेम और सम्मान केवल बड़े आदर्श नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के व्यवहार में अपनाने योग्य मूल्य हैं। किसी की बात ध्यान से सुन लेना, किसी के प्रयास को सराह देना, किसी की गरिमा को ठेस न पहुँचाना—ये छोटे-छोटे कार्य ही समाज को सुंदर बनाते हैं।
अंततः यही सत्य है कि जिस समाज में प्रेम और सम्मान को प्राथमिकता दी जाती है, वही समाज वास्तव में समृद्ध कहलाता है।
क्योंकि सच यही है—
प्रेम और सम्मान देने से बड़ा कोई धन नहीं।

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