प्रभात यादव
मनुष्यता यह कहती है कि जब किसी दूसरे इंसान को कष्ट, दुख या तकलीफ में देखें, तो हमारा मन भीतर से विचलित हो जाए। किसी अनजान की पीड़ा भी हमें बेचैन कर दे, किसी की आंखों के आंसू हमारे अंतर्मन को झकझोर दें और किसी की विवशता हमें भीतर से सवाल पूछने पर मजबूर कर दे—“मैं क्या कर सकता हूँ?” यही मनुष्यता की पहली पहचान है।
इसके ठीक उलट, जाहिलता यह कहती है कि हम दूसरों के दुख में भी अपनी खुशी तलाशें। किसी की हार पर हँसना, किसी के पतन पर ताली बजाना और किसी की मजबूरी को तमाशा बना देना—यह वही क्षुद्र मानसिकता है, जो इंसान को इंसान नहीं, भीड़ का हिस्सा बना देती है। जब संवेदना की जगह मज़ाक, सहानुभूति की जगह तिरस्कार और सहयोग की जगह उपहास ले लेता है, तब समझ लेना चाहिए कि इंसान भीतर से खाली हो चुका है।
दुनिया में दुख और संघर्ष नया नहीं है। हर दौर, हर समाज और हर व्यक्ति अपने हिस्से का दर्द लेकर चलता है। फर्क बस इतना है कि कोई दर्द को देखकर हाथ बढ़ाता है और कोई उसी दर्द को देखकर मुस्कुरा देता है।
जो व्यक्ति दूसरों के कष्ट से विचलित होता है, वह भले ही कमजोर दिखे, लेकिन वास्तव में वही सबसे मजबूत होता है। क्योंकि संवेदना साहस मांगती है—दर्द को महसूस करने का साहस, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस और जरूरत पड़ने पर अपने आराम को त्यागने का साहस।
इसके विपरीत, जो व्यक्ति दूसरों की तकलीफों से खुश होता है, वह भीतर से भयभीत होता है। उसे अपने सच का सामना करने का डर होता है, इसलिए वह दूसरों के गिरने में अपनी ऊँचाई ढूंढता है। यह खुशी क्षणिक होती है, लेकिन इसका दुष्परिणाम स्थायी—मानसिक दरिद्रता और आत्मिक खोखलापन।
समाज का आईना है हमारी संवेदना
किसी भी समाज की असली तस्वीर उसकी इमारतों, तकनीक या आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि उसकी संवेदना से बनती है। जब सड़क पर घायल व्यक्ति मदद का इंतजार करता है और लोग वीडियो बनाने लगते हैं, जब किसी पीड़ित की खबर पर सहानुभूति के बजाय तंज कसे जाते हैं, तब यह केवल व्यक्ति की नहीं, पूरे समाज की गिरावट का संकेत होता है।
मनुष्यता यह सिखाती है कि दुख देखने का उद्देश्य तमाशा नहीं, समाधान होना चाहिए। अगर हम किसी की मदद नहीं कर सकते, तो कम से कम उसकी पीड़ा का मज़ाक तो न बनाएं। चुप रह जाना भी कई बार इंसानियत का पक्ष लेना होता है।
आज के डिजिटल युग में यह अंतर और भी स्पष्ट हो गया है। किसी की त्रासदी मिनटों में “कंटेंट” बन जाती है। लाइक्स, व्यूज़ और फॉलोअर्स की होड़ में इंसान भूल जाता है कि सामने एक जीवित मनुष्य है, कोई स्क्रिप्ट नहीं।
यहाँ मनुष्यता की परीक्षा सबसे कठिन है—क्या हम पीड़ा को समझने वाले बनेंगे या उससे मनोरंजन करने वाले?
असली पहचान का सूत्र
आखिरकार, इंसान की असली पहचान उसके पद, पैसे या प्रसिद्धि से नहीं होती। उसकी पहचान उस क्षण में होती है, जब वह किसी और के दुख के सामने खड़ा होता है।
अगर उसका मन करुणा से भर जाता है—वह मनुष्य है।
अगर उसका मन खुशी से भर जाता है—वह जाहिलता का शिकार है।
बस इतना सा अंतर ही इंसान की असली पहचान है।
यही अंतर तय करता है कि हम सभ्य कहलाने योग्य हैं या केवल भीड़ का हिस्सा।
मनुष्यता चुनना आसान नहीं, लेकिन यही चुनाव इंसान को इंसान बनाता है।






