भरत चतुर्वेदी
स्याही जब तक बोतल में बंद रहती है, तब तक वह केवल एक द्रव है। न उसका कोई अर्थ होता है, न कोई पहचान। लेकिन जैसे ही वह बिखरती है, उसकी नियति तय होने लगती है। यदि वह यूँ ही फैल जाए तो दाग कहलाती है, और यदि किसी सजग हाथ द्वारा, किसी उद्देश्य के साथ बिखेरी जाए तो वही स्याही शब्दों में ढल जाती है। यही शब्द आगे चलकर विचार बनते हैं, विचार व्यवस्था गढ़ते हैं और कभी-कभी इतिहास भी रच देते हैं।
यह उदाहरण केवल स्याही तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन और समाज के हर पहलू पर लागू होता है। इस संसार में वास्तव में कुछ भी अनर्गल, अनावश्यक या अयोग्य नहीं है। समस्या वस्तु या व्यक्ति में नहीं, बल्कि उस दृष्टि और दिशा में है, जिसके माध्यम से हम उनकी क्षमता का मूल्यांकन करते हैं। जिस चीज़ को हम अनुपयोगी मान लेते हैं, वही सही हाथों और सही परिस्थिति में असाधारण उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
समाज अक्सर व्यक्तियों को उनकी वर्तमान स्थिति के आधार पर परखता है। जो व्यक्ति व्यवस्था में फिट नहीं बैठता, उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। जो विचार प्रचलित धारा से अलग होता है, उसे अनर्गल कह दिया जाता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि अधिकांश परिवर्तन इन्हीं कथित अनर्गल और अनुपयोगी तत्वों से जन्मे हैं। यदि हर नई सोच को केवल इसलिए नकार दिया जाता कि वह प्रचलित मानकों से मेल नहीं खाती, तो न कोई नई व्यवस्था जन्म लेती और न ही प्रगति का रास्ता खुलता।
अयोग्यता कोई स्थायी स्थिति नहीं होती। यह केवल गलत दिशा, गलत अवसर या गलत मार्गदर्शन का परिणाम होती है। जिस व्यक्ति को आज समाज बोझ मान रहा है, वही सही प्रशिक्षण, विश्वास और अवसर मिलने पर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सकता है। ठीक उसी तरह जैसे बिखरी हुई स्याही, सही दिशा पाकर अर्थपूर्ण लेखन में बदल जाती है।
अनावश्यकता भी एक भ्रम है। जो वस्तु आज अनुपयोगी प्रतीत होती है, वह कल किसी नई आवश्यकता की पूर्ति कर सकती है। विज्ञान, साहित्य और राजनीति—तीनों क्षेत्रों में ऐसे असंख्य उदाहरण हैं, जहाँ पहले नकारे गए विचार बाद में युगांतकारी सिद्ध हुए। अंतर केवल इतना था कि किसी ने उन्हें सही समय पर, सही दिशा में उपयोग करना सीख लिया।
इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम वस्तुओं और व्यक्तियों को केवल उनकी वर्तमान अवस्था से न आंकें। उनकी अंतर्निहित क्षमता को पहचानें और उसे सही दिशा देने का प्रयास करें। क्योंकि जब क्षमता को दिशा मिल जाती है, तो अनर्गल शब्द भी विचार बन जाते हैं, अनावश्यक वस्तुएँ साधन बन जाती हैं और अयोग्य समझे जाने वाले लोग समाज की रीढ़ बन जाते हैं।
अंततः स्याही कभी व्यर्थ नहीं होती। व्यर्थ केवल उसका बिखराव होता है। जैसे ही उसे उद्देश्य मिलता है, वह दाग नहीं बनाती—वह इतिहास लिखती है।






