सौरभ टंडन
युवा किसी भी देश की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं। भारत जैसे युवा राष्ट्र में यह शक्ति केवल संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि विचार, चरित्र और आचरण में भी निहित है। युवाओं के पास अपने अधिकार हैं—शिक्षा का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समान अवसर—but इन अधिकारों के साथ नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है। जब अधिकार और कर्तव्य साथ चलते हैं, तभी राष्ट्र आगे बढ़ता है।
आज एक बड़ी चुनौती यह है कि युवा ऊर्जा का एक हिस्सा नशा, हिंसा और गलत दिशा के आकर्षण में उलझ रहा है। नशा न केवल शरीर को खोखला करता है, बल्कि निर्णय क्षमता को भी कमजोर करता है। हिंसा और असहिष्णुता समाज में विभाजन पैदा करती हैं। सोशल मीडिया पर तात्कालिक लोकप्रियता और गलत आदर्श युवाओं को भटकाव की ओर ले जाते हैं, जिससे उनकी प्रतिभा और समय—दोनों का नुकसान होता है।
इसके विपरीत, सकारात्मक सोच, अनुशासन और सामाजिक सेवा युवाओं को सशक्त बनाते हैं। खेल, योग, कला और रचनात्मक गतिविधियाँ आत्मसंयम और टीमवर्क सिखाती हैं। स्वयंसेवा, रक्तदान, स्वच्छता अभियान, शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण जैसे कार्य युवाओं को समाज से जोड़ते हैं और नेतृत्व क्षमता विकसित करते हैं। जब युवा अपने समय और कौशल का एक हिस्सा समाज को लौटाते हैं, तो उनमें उद्देश्यबोध और आत्मविश्वास बढ़ता है।
नैतिक जिम्मेदारी का अर्थ केवल गलत से बचना नहीं, बल्कि सही के लिए खड़े होना भी है। ईमानदारी, संवेदनशीलता और कानून का सम्मान—ये गुण लोकतंत्र को मजबूत करते हैं। डिजिटल युग में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है: फेक न्यूज़ से बचना, नफरत नहीं फैलाना, और संवाद को मर्यादा में रखना—यही सशक्त नागरिकता की पहचान है।यदि युवा खुद को केवल अपने करियर और निजी सफलता तक सीमित न रखें, बल्कि समाज और देश के व्यापक हित में सोचें, तो परिवर्तन अवश्यंभावी है। इतिहास गवाह है कि जब-जब युवाओं ने जिम्मेदारी उठाई है, तब-तब राष्ट्र ने नई दिशा पाई है।आज भी वही आवश्यकता है—अधिकारों के साथ कर्तव्य निभाने वाले युवा। तब कोई भी ताकत भारत को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।

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