नानक चंद्र
भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है, लेकिन यही युवा शक्ति बेरोज़गारी की सबसे गहरी मार भी झेल रही है। डिग्रियों की संख्या बढ़ रही है, कोचिंग संस्थान फल-फूल रहे हैं, लेकिन रोज़गार के अवसर घटते जा रहे हैं। यह विरोधाभास आज के युवा वर्ग की सबसे बड़ी पीड़ा बन चुका है।
प्रतियोगी परीक्षाओं का हाल किसी युद्ध से कम नहीं। सीमित सीटें और लाखों अभ्यर्थी—यह असंतुलन युवाओं को शुरू से ही हार की मनोस्थिति में धकेल देता है। वर्षों की तैयारी, पारिवारिक उम्मीदें और आर्थिक दबाव के बीच जब परिणाम नहीं मिलते, तो निराशा गहरी होती जाती है। ऊपर से पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और बार-बार परीक्षा रद्द होने की घटनाएँ युवाओं के भरोसे को लगातार झकझोरती रही हैं।
इसका सीधा असर मानसिक स्वास्थ्य पर दिख रहा है। गुस्सा, अवसाद और हताशा अब व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक संकेत बन चुके हैं। रोजगार की तलाश में पलायन बढ़ रहा है—गांव खाली हो रहे हैं, शहरों पर दबाव बढ़ रहा है, और असंगठित क्षेत्र में अस्थायी काम युवाओं की मजबूरी बनता जा रहा है। स्थिर आय और करियर की अनिश्चितता ने परिवार नियोजन, विवाह और उद्यमिता जैसे निर्णयों को भी टाल दिया है।
नीति-निर्माण के स्तर पर घोषणाएँ होती हैं, लेकिन जमीन पर क्रियान्वयन कमजोर पड़ता दिखता है। स्किलिंग और अप्रेंटिसशिप की बात तो होती है, पर उद्योग-शिक्षा का वास्तविक जुड़ाव अब भी अधूरा है। स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन, एमएसएमई को सस्ती पूंजी, स्टार्टअप के लिए भरोसेमंद बाजार और पारदर्शी भर्ती—इन मोर्चों पर ठोस प्रगति जरूरी है।
यदि यही रफ्तार रही, तो जिस “डेमोग्राफिक डिविडेंड” को देश की ताकत कहा जाता है, वह डेमोग्राफिक बोझ में बदल सकता है। युवा ऊर्जा तब ही राष्ट्रनिर्माण में बदलेगी, जब शिक्षा के साथ अवसर, और सपनों के साथ स्थिर रोजगार मिलेगा। वरना डिग्रियों का बोझ उठाए यह पीढ़ी सवाल करती रहेगी—तैयारी किस लिए, अगर मंज़िल ही धुंधली हो?






