भरत चतुर्वेदी
“मरे आदमी और सोए आदमी में अंतर ही कितना होता है भला! बस एक साँस की डोरी! वह टूटी और आदमी गया!”
— महाभोज से यह पंक्ति केवल साहित्यिक कथन नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दृष्टि का गहन दार्शनिक संकेत है। यह पंक्ति हमें उस सूक्ष्म रेखा की ओर ले जाती है, जहाँ नींद और मृत्यु एक-दूसरे के निकट आ खड़ी होती हैं—एक अस्थायी विराम, दूसरी अंतिम परिवर्तन।
भारतीय चिंतन में नींद को केवल शारीरिक थकान का परिणाम नहीं माना गया, बल्कि इसे मृत्यु की अनुभूति के समान देखा गया है। गहरी नींद में जब चेतना बाह्य जगत से कट जाती है, तब शरीर जीवित होते हुए भी निष्क्रिय-सा प्रतीत होता है। सांस चल रही होती है, हृदय धड़क रहा होता है, पर ‘मैं’ का बोध क्षणभर को विलीन हो जाता है। यही कारण है कि शास्त्रों में नींद को नित्य मृत्यु कहा गया—एक ऐसी मृत्यु, जिससे हम प्रतिदिन लौट आते हैं।
मृत्यु और नींद में अंतर वास्तव में अत्यंत सूक्ष्म है। नींद से जागने पर हमारा शरीर वही रहता है, स्मृतियाँ वही रहती हैं, पहचान वही बनी रहती है। परंतु मृत्यु के बाद—भारतीय अध्यात्म के अनुसार—जागरण नए शरीर के साथ होता है। यह जागरण पूर्वजन्म के कर्मों के अनुरूप होता है। कर्म ही वह अदृश्य सेतु है, जो एक जीवन को दूसरे जीवन से जोड़ता है।
यहीं भारतीय दर्शन की मूल अवधारणा सामने आती है—कर्म सिद्धांत। जीवन में जो हम करते हैं, वही हमारे भविष्य का स्वरूप रचता है। न भाग्य अटल है, न दुर्भाग्य शाश्वत। कर्मों के माध्यम से ही भाग्य का निर्माण होता है। अच्छे कर्म केवल इस जीवन को ही संतुलित और अर्थपूर्ण नहीं बनाते, बल्कि आने वाले जीवन की दिशा भी निर्धारित करते हैं।
भारतीय अध्यात्म यह मानता है कि वैभव, समृद्धि और उन्नत जीवन केवल संयोग नहीं हैं। वे पूर्वकृत शुभ कर्मों की परिणति हैं। इसलिए जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक सुखों का उपभोग नहीं, बल्कि चेतन, नैतिक और करुणामय कर्मों के माध्यम से आत्मिक उन्नति करना है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि हर कर्म एक बीज है—जो कभी न कभी फल देगा—तब उसका जीवन स्वतः संयमित और जिम्मेदार हो जाता है।
नींद हमें प्रतिदिन यह स्मरण कराती है कि चेतना का लोप अस्थायी भी हो सकता है और स्थायी भी। मृत्यु उसी सत्य का स्थायी रूप है। अंतर केवल इतना है कि नींद से हम पुराने शरीर में लौटते हैं, और मृत्यु के बाद नए शरीर में प्रवेश करते हैं। इस निरंतर यात्रा में यदि कोई स्थायी पूंजी है, तो वह है—कर्म।
अतः भारतीय चिंतन हमें यह सिखाता है कि जीवन को भय के साथ नहीं, बोध के साथ जिया जाए। नींद और मृत्यु दोनों ही हमें विनम्र बनाती हैं, यह बताने के लिए कि सांस की डोरी कितनी नाजुक है। इसी नाजुकता में जीवन की महानता छिपी है—जहाँ हर क्षण एक अवसर है, बेहतर कर्म करने का, ताकि अगला जागरण अधिक उजास से भरा हो।

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