नितिन कुमार
भारत को युवाओं का देश कहा जाता है। आंकड़ों के अनुसार देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। यही युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत माने जाते हैं, लेकिन आज यही वर्ग सबसे अधिक हताश, असुरक्षित और भ्रमित नज़र आ रहा है। विकास, आत्मनिर्भरता और विश्वगुरु बनने के बड़े-बड़े दावों के बीच ज़मीनी सच्चाई यह है कि देश का युवा आज बेरोज़गारी और अनिश्चित भविष्य से जूझ रहा है।
सरकारी मंचों और रिपोर्टों में रोज़गार के अवसर बढ़ने की तस्वीर पेश की जाती है, लेकिन हकीकत में पढ़ा-लिखा युवा डिग्री लेकर दर-दर भटकने को मजबूर है। इंजीनियर, स्नातक, परास्नातक—हर वर्ग का युवा या तो बेरोज़गार है या फिर अपनी योग्यता से कहीं कम वेतन पर अस्थायी नौकरी करने को मजबूर है। रोजगार के नाम पर इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप और संविदा जैसी व्यवस्थाएं स्थायी भविष्य का भरोसा नहीं दे पा रही हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं की स्थिति युवाओं के टूटते भरोसे की सबसे बड़ी मिसाल बन चुकी है। पेपर लीक, परीक्षाओं का बार-बार रद्द होना, भर्तियों में वर्षों की देरी और परिणामों में पारदर्शिता की कमी ने युवाओं को मानसिक रूप से तोड़ दिया है। कई युवा अपने जीवन के कीमती वर्ष एक ही परीक्षा की तैयारी में लगा देते हैं। न उम्र रुकती है, न पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और न ही आर्थिक दबाव कम होता है। अंततः थक-हारकर वही युवा हताशा का शिकार हो जाता है।
निजी क्षेत्र में हालात इससे बेहतर नहीं हैं। यहां नौकरी तो मिल जाती है, लेकिन सुरक्षा नहीं। कॉन्ट्रैक्ट जॉब, कम वेतन, लंबे कार्य घंटे और सामाजिक सुरक्षा का अभाव युवाओं को स्थायी मानसिक तनाव में डाल रहा है। भविष्य की अनिश्चितता के कारण युवा न तो परिवार की जिम्मेदारी ठीक से उठा पा रहा है और न ही जीवन की दीर्घकालिक योजना बना पा रहा है।
इस स्थिति का असर अब समाज में साफ दिखने लगा है। बेरोज़गारी और असुरक्षा से उपजा तनाव अपराध, नशे, अवसाद और आत्महत्या जैसी गंभीर सामाजिक समस्याओं को जन्म दे रहा है। जब मेहनत और प्रतिभा के बावजूद अवसर न मिलें, तो व्यवस्था से भरोसा टूटना स्वाभाविक है। यही टूटा हुआ भरोसा लोकतंत्र और सामाजिक स्थिरता के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है।
समाधान केवल नारों, आंकड़ों और विज्ञापनों से नहीं निकलेगा। ज़रूरत है एक ठोस और ईमानदार रोजगार नीति की, जिसमें समयबद्ध भर्तियां हों, परीक्षाओं की विश्वसनीयता सुनिश्चित की जाए और कौशल आधारित शिक्षा को वास्तव में ज़मीन पर उतारा जाए। उद्योग, शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को पाटे बिना युवाओं का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।
यदि देश को सच में आगे बढ़ाना है, तो युवाओं को केवल भाषणों में नहीं, बल्कि नीति और नीयत दोनों में प्राथमिकता देनी होगी। युवाओं का भरोसा लौटाना सरकार और व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। क्योंकि जब युवा मजबूत होगा, तभी देश का भविष्य मजबूत होगा।

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