प्रभात यादव
जीवन और राजनीति—दोनों एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जीवन जहां व्यक्ति के संस्कार, संघर्ष और संवेदनाओं का आईना है, वहीं राजनीति समाज की सामूहिक चेतना, दिशा और निर्णयों का मंच। जब जीवन मूल्यों से कटता है, तो राजनीति स्वार्थ का खेल बन जाती है; और जब राजनीति संवेदनशील होती है, तो जीवन में न्याय और भरोसा पनपता है।
जीवन हमें सिखाता है कि हर निर्णय का परिणाम होता है। यही सिद्धांत राजनीति पर भी लागू होता है। सत्ता में लिया गया हर फैसला लाखों-करोड़ों जिंदगियों को प्रभावित करता है। इसलिए राजनीति केवल रणनीति नहीं, नैतिक जिम्मेदारी भी है। दुर्भाग्य से आज राजनीति में तात्कालिक लाभ, चुनावी गणित और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा अक्सर दीर्घकालिक जनहित पर भारी पड़ती दिखती है।
राजनीति का मूल उद्देश्य सेवा होना चाहिए, न कि सत्ता का सुख। जब नेता जीवन के अनुभवों—गरीबी, पीड़ा, संघर्ष—से जुड़े होते हैं, तब उनकी राजनीति जमीन से जुड़ी होती है। लेकिन जब सत्ता जीवन से कट जाती है, तब नीतियां कागजों में अच्छी लगती हैं, जमीनी हकीकत में नहीं। यही दूरी जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच अविश्वास की खाई बनाती है।
जीवन हमें धैर्य सिखाता है, राजनीति को भी यही सीख चाहिए। त्वरित फैसले, भावनात्मक उन्माद और ध्रुवीकरण से ताली तो मिल सकती है, समाधान नहीं। लोकतंत्र संवाद से चलता है—सुनने की क्षमता, असहमति का सम्मान और सहमति बनाने का धैर्य—यही स्वस्थ राजनीति की पहचान है। जब राजनीति में संवाद मरता है, तब सड़कें बोलने लगती हैं।
युवाओं के लिए जीवन और राजनीति का संबंध और भी महत्वपूर्ण है। युवा ऊर्जा यदि केवल नारों तक सीमित रह जाए, तो वह क्षणिक होती है; लेकिन यदि वही ऊर्जा नीति, शिक्षा, रोजगार और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर केंद्रित हो, तो वह राष्ट्र निर्माण की शक्ति बनती है। राजनीति को युवाओं से डरना नहीं चाहिए; उसे युवाओं को भागीदार बनाना चाहिए।
राजनीति का एक बड़ा संकट जवाबदेही का है। जीवन में हम अपनी गलतियों का सामना करते हैं; राजनीति में भी यही साहस चाहिए। गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं, परिपक्वता है। जब नेता जिम्मेदारी लेते हैं, तो संस्थाएं मजबूत होती हैं; जब वे बचाव की राजनीति करते हैं, तो भरोसा टूटता है।
जीवन सादगी मांगता है, राजनीति भी। दिखावे, भाषणों और प्रचार से आगे बढ़कर यदि नीति का केंद्र मानव गरिमा बने—स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और अवसर—तो राजनीति फिर से सम्मान पाएगी। सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन निर्णयों की छाप स्थायी होती है।
अंततः जीवन और राजनीति का मेल तभी सार्थक है, जब दोनों का लक्ष्य एक हो—जनकल्याण। यदि राजनीति जीवन की संवेदनाओं से जुड़ जाए और जीवन राजनीति की जिम्मेदारियों को समझे, तो लोकतंत्र केवल व्यवस्था नहीं, विश्वास बन जाएगा। यही वह रास्ता है, जहां सत्ता नहीं, सेवा प्रधान होती है; और जहां राजनीति जीवन को बेहतर बनाती है, न कि उससे दूर ले जाती है।


