भरत चतुर्वेदी
भारतीय राजनीति विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की आत्मा है। यह केवल सत्ता के संघर्ष तक सीमित नहीं, बल्कि देश की सामाजिक संरचना, आर्थिक दिशा, सांस्कृतिक पहचान और आम नागरिक के जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है। आज़ादी के बाद से अब तक भारतीय राजनीति ने अनेक उतार–चढ़ाव देखे हैं, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था ने हर चुनौती के बीच खुद को जीवित और प्रासंगिक बनाए रखा है।
भारत की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है। यहाँ भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्र और विचारधाराओं का विशाल संसार है। यही विविधता राजनीति को जटिल बनाती है, लेकिन साथ ही इसे जीवंत भी रखती है। चुनाव केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे जनता की अपेक्षाओं, गुस्से, आशाओं और सपनों की अभिव्यक्ति भी होते हैं।
समय के साथ भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव आए हैं। एक दौर था जब विचारधाराएँ और नीतियाँ राजनीति का केंद्र हुआ करती थीं। आज राजनीति का बड़ा हिस्सा व्यक्तित्व, छवि और चुनावी प्रबंधन के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है। सोशल मीडिया, टीवी डिबेट और डिजिटल प्रचार ने राजनीति को घर-घर तक पहुँचा दिया है, लेकिन इसके साथ ही सतही विमर्श, अफवाहें और ध्रुवीकरण भी बढ़ा है।
भारतीय राजनीति की एक बड़ी सच्चाई यह भी है कि जाति और धर्म आज भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। कई बार विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और पहचान की राजनीति हावी हो जाती है। इससे लोकतंत्र कमजोर नहीं होता, लेकिन उसकी दिशा भटकने लगती है। जब चुनाव भावनाओं पर अधिक और नीतियों पर कम लड़े जाते हैं, तब जनहित प्रभावित होता है।
सत्ता और विपक्ष—दोनों लोकतंत्र के स्तंभ हैं। मजबूत सरकार के साथ मजबूत विपक्ष भी उतना ही जरूरी है। दुर्भाग्य से कई बार राजनीति में संवाद की जगह टकराव और आरोप-प्रत्यारोप हावी हो जाते हैं। संसद और विधानसभाओं में बहस की जगह शोर बढ़ता है, जिससे जनता के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
भ्रष्टाचार, परिवारवाद और अवसरवाद भारतीय राजनीति की पुरानी चुनौतियाँ रही हैं। हालांकि जनता अब पहले से अधिक जागरूक है। वोटर सिर्फ नारे नहीं, बल्कि काम और जवाबदेही भी मांगने लगा है। यही कारण है कि कई बार सत्ता परिवर्तन अप्रत्याशित रूप से होता है, जो लोकतंत्र की मजबूती का प्रमाण है।
भारतीय राजनीति का भविष्य युवा पीढ़ी के हाथ में है। आज का युवा सवाल करता है, जानकारी रखता है और अपनी आवाज़ उठाने से नहीं डरता। यदि यही युवा राजनीति में केवल दर्शक न रहकर सक्रिय भागीदारी करे, तो व्यवस्था में वास्तविक बदलाव संभव है।
अंततः भारतीय राजनीति न तो पूरी तरह उजली है, न पूरी तरह अंधेरी। यह एक सतत प्रक्रिया है—संघर्ष, सुधार और संतुलन की। जब राजनीति जनसेवा का माध्यम बनेगी, न कि केवल सत्ता का रास्ता, तभी लोकतंत्र अपने वास्तविक उद्देश्य को पूरा कर पाएगा। भारत की ताकत उसकी जनता है, और जब जनता सजग रहती है, तब राजनीति भी सही दिशा में चलने को मजबूर होती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here