प्रशांत कटियार
राष्ट्र, धर्म और सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए इतिहास में अनेक बलिदान दिए गए, लेकिन जो स्थान गुरु श्री गोबिन्द सिंह जी महाराज के चार साहिबजादों के बलिदान को प्राप्त है, वह अद्वितीय और अनुपम है। उनका बलिदान केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि भारत की आत्मा में रची-बसी वह चेतना है, जो अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस देती है।
बाल अवस्था में अदम्य वीरता
चारों साहिबजादे—साहिबजादा अजीत सिंह, साहिबजादा जुझार सिंह, साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह—बाल अवस्था में ही धर्म और सत्य के मार्ग पर अडिग रहे। दो साहिबजादों ने युद्धभूमि में वीरगति पाई, वहीं दो नन्हे साहिबजादों ने अत्याचार के सामने झुकने के बजाय दीवार में चिनवाया जाना स्वीकार किया, लेकिन धर्म परिवर्तन नहीं किया। यह इतिहास नहीं, साहस का जीवंत उदाहरण है।
साहिबजादों का बलिदान यह सिखाता है कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और मानवता की रक्षा का संकल्प है। उन्होंने यह प्रमाणित किया कि उम्र नहीं, विचार और संस्कार किसी व्यक्ति को महान बनाते हैं। उनका जीवन और बलिदान आज भी यह प्रश्न करता है—क्या हम अन्याय के सामने मौन हैं या सत्य के साथ खड़े हैं?
वीर बाल दिवस केवल श्रद्धांजलि का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। यह दिन देश की युवा पीढ़ी को यह सिखाता है कि राष्ट्रभक्ति शब्दों से नहीं, बल्कि कर्तव्य और त्याग से सिद्ध होती है। साहिबजादों की गाथा हमें बताती है कि राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा के लिए साहस, अनुशासन और आत्मबल आवश्यक है।
आज के समय में प्रासंगिकता
आज जब मूल्य, सिद्धांत और नैतिकता की कसौटी पर समाज खड़ा है, तब साहिबजादों का बलिदान हमें दिशा देता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सत्य कठिन हो सकता है, लेकिन वही स्थायी होता है। यदि समाज का हर व्यक्ति अपने कर्तव्य को समझे, तो राष्ट्र स्वतः सशक्त होगा।
वीर बाल दिवस पर चारों साहिबजादों को शत-शत नमन। उनकी अमर गाथा युगों-युगों तक राष्ट्रभक्ति, धर्मनिष्ठा और कर्तव्यनिष्ठ जीवन का पथ आलोकित करती रहेगी।
जय साहिबजादे। जय भारत।

लेखक यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप के स्टेड हेड हैं

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