प्रशांत कटियार
आज सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन चुका है, जिसके बिना दिन अधूरा सा लगता है। मोबाइल हाथ में आते ही फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और रील्स की दुनिया खुल जाती है। शुरुआत में यह सब मनोरंजन और जानकारी का साधन था, लेकिन धीरे-धीरे यही प्लेटफॉर्म खुलेआम अश्लीलता परोसने का माध्यम बनते जा रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस अश्लीलता की चपेट में सबसे पहले हमारी युवा पीढ़ी और मासूम बच्चे आ रहे हैं।
आज हालात यह हैं कि अश्लील हाव-भाव, भड़काऊ कपड़े, द्विअर्थी संवाद और आपत्तिजनक इशारे सोशल मीडिया पर आम हो गए हैं। इन्हें “ट्रेंड” और “वायरल” कहकर परोसा जा रहा है। लाइक और व्यूज़ की दौड़ में लोग यह भूल चुके हैं कि जो कंटेंट वे बना या साझा कर रहे हैं, उसे देखने वालों में बच्चे भी शामिल हैं। सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म भी ऐसे ही कंटेंट को ज्यादा बढ़ावा देता है, क्योंकि इससे प्लेटफॉर्म की कमाई बढ़ती है, चाहे समाज को कितना ही नुकसान क्यों न हो।
सबसे गहरा असर बच्चों पर पड़ रहा है। कम उम्र में ही बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन आ चुका है। न माता-पिता की निगरानी, न उम्र के हिसाब से कंटेंट की छंटनी। नतीजा यह है कि बच्चे ऐसी चीजें देख रहे हैं, जिन्हें समझने की उनकी मानसिक क्षमता ही नहीं होती। इससे उनके मन में असमय जिज्ञासा पैदा होती है, पढ़ाई से ध्यान भटकता है और व्यवहार में चिड़चिड़ापन व आक्रामकता आने लगती है। बचपन, जो संस्कार सीखने और सही-गलत समझने का समय होना चाहिए, वह मोबाइल स्क्रीन में गुम होकर रह गया है।
युवा वर्ग पर भी इसका असर कम खतरनाक नहीं है। रिश्तों को अब सम्मान और भरोसे की नजर से नहीं, बल्कि केवल शरीर और आकर्षण के नजरिए से देखा जाने लगा है। वायरल होने की चाह में युवा किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखते हैं। मर्यादा, आत्मसम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे शब्द उन्हें पुराने जमाने की बातें लगने लगी हैं। यही कारण है कि समाज में रिश्तों की कड़वाहट, मानसिक तनाव और अपराधों की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
इस पूरी स्थिति के लिए केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को ही दोष देना सही नहीं होगा। माता-पिता, शिक्षक और समाज भी कहीं न कहीं अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटते दिख रहे हैं। बच्चों को चुप कराने के लिए मोबाइल पकड़ा देना आसान है, लेकिन उनके डिजिटल संसार पर नजर रखना मुश्किल काम लगता है। स्कूलों में नैतिक शिक्षा केवल किताबों तक सिमट गई है और घरों में संवाद की जगह डांट या अनदेखी ने ले ली है।
कानून मौजूद हैं, नियम भी बने हुए हैं, लेकिन उनका पालन ढीला है। सोशल मीडिया कंपनियां मुनाफे के आगे नैतिकता को अक्सर नजरअंदाज कर देती हैं। अश्लील कंटेंट पर सख्ती तभी संभव है, जब समाज खुद इसे सामान्य मानना बंद करे और इसका विरोध करना सीखे।
आज जरूरत इस बात की है कि हम समय रहते चेत जाएं। तकनीक से भागना संभव नहीं है, लेकिन उसका सही इस्तेमाल सिखाना हमारी जिम्मेदारी है। अगर आज हमने बच्चों और युवाओं को सोशल मीडिया पर परोसी जा रही अश्लीलता से नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ी तकनीक में तो आगे होगी, लेकिन संस्कार और संवेदनशीलता में पीछे छूट जाएगी। अब फैसला हमें करना है कि हम स्क्रीन को अपनी अगली पीढ़ी का शिक्षक बनाएंगे या खुद उन्हें सही रास्ता दिखाएंगे।
-लेखक यूथ इंडिया न्यूज़ ग्रुप के स्टेट हेड हैं।






