हम क्या हैं यह हम ही जानते
भरत चतुर्वेदी
मनुष्य का जीवन बाहर से जितना सरल दिखता है, भीतर से उतना ही उलझा हुआ होता है। समाज हमें हमारे पहनावे, हमारे शब्दों, हमारी चुप्पी या हमारी सफलता-असफलता के पैमानों से आंकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि हम क्या हैं, यह सिर्फ हम ही जानते हैं।दुनिया को हमारे जीवन का केवल एक हिस्सा दिखाई देता है, पूरा सच नहीं।
लोग हमारे व्यवहार से हमारे चरित्र का अनुमान लगाते हैं, हमारी खामोशी से हमारी कमजोरी तय कर देते हैं और हमारी मजबूती को घमंड समझ लेते हैं। कोई यह नहीं जानता कि हम किन हालातों से गुज़रकर यहां तक पहुंचे हैं, किन रातों को बिना कहे रोए हैं और किन हालातों में खुद को संभालकर खड़ा रखा है।
आज की दुनिया तथ्यों से ज्यादा अंदाज़ों पर चलती है।
लोग सुनते कम हैं, मान लेते ज्यादा हैं। देखते कम हैं, आंकते ज्यादा हैं।
हमारे एक फैसले को लेकर हमारी पूरी सोच पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। हमारी एक चुप्पी को कमजोरी और एक विरोध को बदतमीजी कह दिया जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि हर इंसान के फैसलों के पीछे उसका संघर्ष, उसका अनुभव और उसका दर्द छिपा होता है।
जीवन की सबसे गहरी सीख यही है कि हमारी आंखें वही लोग खोलते हैं, जिन पर हम पूरी तरह आंखें बंद करके भरोसा करते हैं।
भरोसा कोई साधारण भावना नहीं, यह आत्मा से जुड़ा रिश्ता होता है। जब हम किसी पर भरोसा करते हैं, तो अपने डर, अपने राज़ और अपनी कमजोरियां उसके हाथों में सौंप देते हैं। लेकिन जब वही भरोसा टूटता है, तो सिर्फ रिश्ता नहीं टूटता — इंसान भीतर से बदल जाता है।
उस पल इंसान दुनिया को नहीं, बल्कि लोगों को नए नजरिए से देखने लगता है। वह सीखता है कि हर अपनापन सच्चा नहीं होता और हर मुस्कान भरोसे के काबिल नहीं होती।
धोखा, विश्वासघात और निराशा इंसान को तोड़ती जरूर हैं, लेकिन यहीं से असली समझ पैदा होती है।
यहीं से इंसान दूसरों को नहीं, खुद को पढ़ना सीखता है।
यहीं से वह जान पाता है कि हर किसी को सब कुछ बताना जरूरी नहीं होता।
जो इंसान टूटकर भी खड़ा हो जाए, वही सच में मजबूत होता है।
अक्सर सबसे गहरे लोग सबसे ज्यादा खामोश होते हैं। उनकी चुप्पी में कमजोरी नहीं, अनुभव होता है। वे हर बात पर प्रतिक्रिया नहीं देते, क्योंकि उन्होंने समझ लिया होता है कि हर जवाब जरूरी नहीं और हर लड़ाई लड़ने लायक नहीं होती।
खामोशी इंसान की हार नहीं, बल्कि उसकी परिपक्वता का प्रमाण होती है।
जब इंसान खुद को समझ लेता है, तब दूसरों की राय की अहमियत कम होने लगती है। तारीफ उसे उड़ाती नहीं और आलोचना उसे तोड़ती नहीं। क्योंकि उसे पता होता है कि वह क्या है, क्यों है और कहां तक पहुंच सकता है।
आत्मबोध ही असली शक्ति है।
और यही शक्ति इंसान को भीड़ में अकेला लेकिन अडिग बनाती है।
हम क्या हैं — यह जानने के लिए दुनिया की मंजूरी की जरूरत नहीं।
यह जवाब हमारे भीतर है।
लोग केवल अंदाज़ा लगा सकते हैं, फैसला नहीं।
और शायद यही जीवन की सबसे खूबसूरत सच्चाई है।


