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Sunday, April 5, 2026

बेमौसम बारिश का कहर: किसानों की मेहनत पर प्रकृति की मार।

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-सुनील कुमार महला

भारत विश्व का एक प्रमुख कृषि प्रधान देश है, जहाँ आज भी बड़ी आबादी की आजीविका कृषि पर निर्भर है। दूसरे शब्दों में, भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खेती-किसानी से जुड़ा हुआ है। यहाँ कृषि मुख्यतः प्रकृति, विशेषकर मानसून पर आधारित है, इसलिए इसे अक्सर ‘मानसून का जुआ’ कहा जाता है।मार्च और अप्रैल का समय किसानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। वास्तव में, यही वह अवधि होती है जब रबी फसलें पककर तैयार हो जाती हैं और उनकी कटाई शुरू होती है। यह समय किसानों के लिए उनके पूरे वर्ष के परिश्रम और आशाओं के साकार होने का होता है। लेकिन विडंबना यह है कि हर वर्ष की तरह इस बार भी बेमौसम बारिश ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। तैयार खड़ी फसलें खेतों में ही नष्ट हो रही हैं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल उनकी आजीविका को प्रभावित करती है, बल्कि कृषि क्षेत्र की अनिश्चितता को भी उजागर करती है।

बहरहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि वर्तमान में उत्तर भारत के कई हिस्सों में बेमौसम मौसम का कहर देखने को मिल रहा है। राजस्थान के हाड़ौती और बीकानेर क्षेत्रों में हुई तेज ओलावृष्टि ने किसानों की कमर तोड़ दी है। खेतों में खड़ी गेहूं, सरसों और चना जैसी रबी फसलें, जो कटाई के लिए पूरी तरह तैयार थीं, अचानक गिरे ओलों और बारिश की मार से बर्बाद हो गईं। कई स्थानों पर ओलों की मोटी परत ने खेतों को सफेद चादर से ढक दिया, जो किसानों के लिए किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं है।इसी प्रकार हरियाणा और पंजाब में भी ओलावृष्टि तथा तेज आंधी-बारिश ने भारी नुकसान पहुँचाया है। इन राज्यों में भी गेहूं की फसल कटाई के लिए तैयार थी, लेकिन अचानक बदले मौसम ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया। फसलें खेतों में गिर गईं, दाने झड़ गए और उनकी गुणवत्ता प्रभावित हुई, जिससे बाजार में कीमतों पर भी असर पड़ने की आशंका है।

यहां पाठकों को यह बताता चलूं कि राजस्थान के जयपुर से जैसलमेर तक कई जिलों में तेज बारिश, आंधी और ओलावृष्टि दर्ज हुई।बीकानेर, जोधपुर, अजमेर, कोटा, भरतपुर और उदयपुर संभागों में भी इसका असर देखने को मिला।कई स्थानों पर बड़े आकार के ओले (नींबू जितने) गिरे, जिससे फसलों और मकानों को नुकसान हुआ। इसी तरह से पंजाब राज्य में गरज-चमक के साथ बारिश और कई स्थानों पर ओले गिरने की पुष्टि हुई है तथा 3–5 अप्रैल के दौरान ओलावृष्टि की चेतावनी और असर, विशेषकर मालवा- दोआबा क्षेत्रों में देखने को मिला।हरियाणा में भी 3-4 अप्रैल को तेज हवाएं, बारिश और ओलावृष्टि दर्ज की गई। वहीं उत्तर प्रदेश के लखनऊ में ओलावृष्टि दर्ज हुई तो कानपुर, नोएडा, गाजियाबाद, आगरा सहित पश्चिमी यूपी के कई जिलों में भी इसका असर देखने को मिला। 3–5 अप्रैल के बीच पश्चिमी यूपी और 4–5 अप्रैल को पूर्वी यूपी में ओलावृष्टि की स्थिति देखने को मिली। उत्तराखंड के चकराता क्षेत्र में ओलावृष्टि से फसलों को भारी नुकसान हुआ तथा 3-7 अप्रैल के बीच पर्वतीय क्षेत्रों में ओलावृष्टि और तेज हवाओं का अलर्ट जारी किया गया है। हिमाचल प्रदेश के कई हिस्सों में बारिश के साथ ओलावृष्टि और ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी तथा 3-4 अप्रैल को अलग-अलग स्थानों पर ओले गिरने की चेतावनी और घटनाएं हुईं।इसी प्रकार से जम्मू-कश्मीर के मैदानी क्षेत्रों में बारिश और कुछ स्थानों पर ओलावृष्टि, जबकि ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी तथा 4-9 अप्रैल के बीच गरज-चमक, तेज हवाओं और ओलावृष्टि की संभावना जताई गई।विशेषज्ञों के अनुसार, इस असामान्य मौसम का मुख्य कारण सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ है, जो बार-बार उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश और ओलावृष्टि ला रहा है। यह स्थिति कृषि पर निर्भर करोड़ों किसानों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है, क्योंकि उनकी आजीविका पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है। वास्तव में, देश के विभिन्न हिस्सों में लगातार हो रही ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कृषि आज भी प्राकृतिक जोखिमों से घिरी हुई है। ऐसी स्थिति में किसानों को समय पर मुआवजा, फसल बीमा का लाभ और सटीक मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है, ताकि उनके नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सके।दिन-रात मेहनत करने के बाद भी यदि किसान को उसका उचित फल न मिले, तो उसका दर्द वही समझ सकता है जिसने उसे झेला हो। वर्तमान परिस्थितियों में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने किसानों की इसी मेहनत को प्रभावित किया है। पंजाब सहित कई राज्यों में गेहूं की फसल पकने के अंतिम चरण में है, और ऐसे समय में खराब मौसम से फसलों को भारी नुकसान हो रहा है। यह स्थिति विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए अत्यंत चिंताजनक है, जिनकी आजीविका पूरी तरह खेती पर निर्भर होती है। गौरतलब है कि आज भी देश के अधिकांश किसानों के पास सीमित संसाधन हैं, ऐसे में फसल खराब होने पर उनका आर्थिक संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है। यद्यपि सरकार ने प्राकृतिक आपदाओं से राहत के लिए कई योजनाएँ शुरू की हैं, फिर भी इनका लाभ हर जरूरतमंद किसान तक पहुँचना अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। हाल फिलहाल, बैसाखी का पर्व निकट है, जो गेहूं की कटाई का प्रमुख समय माना जाता है। लेकिन मौसम की अनिश्चितता ने किसानों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो उत्पादन में कमी आएगी, जिसका प्रभाव न केवल किसानों की आय पर पड़ेगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और जीडीपी पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। इस गंभीर परिस्थिति में कृषि विशेषज्ञों को ऐसी उन्नत तकनीकों का विकास करना चाहिए, जो बदलते मौसम के अनुसार फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकें। साथ ही, सरकार को प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा प्रदान करना चाहिए और अगली फसल के लिए आसान ऋण उपलब्ध कराना चाहिए। संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए जाने चाहिए कि किसानों को किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। इसके अतिरिक्त, अनाज मंडियों और भंडारण की समुचित व्यवस्था भी आवश्यक है, ताकि किसानों की उपज सुरक्षित रह सके और उन्हें उचित मूल्य मिल सके।

अंत में संक्षेप में यही कहूंगा कि बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय कृषि आज भी प्राकृतिक अनिश्चितताओं के बीच संघर्ष कर रही है। ऐसे में समय पर राहत, सुदृढ़ फसल बीमा, सटीक मौसम पूर्वानुमान और उन्नत कृषि तकनीकों का विकास ही किसानों को इस संकट से उबारने का प्रभावी मार्ग बन सकता है।

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।मोबाइल 9828108858

 

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