पढ़े-लिखे लोगों में ज्‍यादा है जातिवाद: राज्‍यपाल आनंदीबेन पटेल

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वाराणसी, यूथ इंडिया। यूपी की राज्‍यपाल आनंदीबेन पटेल ने शनिवार को कहा कि जातिवाद शिक्षित लोगों में सबसे अधिक प्रचलित है। हमें जातिवाद से बाहर आना होगा, तभी हम अपने देश को आगे ले जा सकेंगे।

वह वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के 41वें दीक्षांत समारोह में छात्रों और प्रोफेसरों को संबोधित कर रही थीं। समारोह की अध्यक्षता राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने की। समारोह में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रोफेसर श्रीनिवास वरखेड़ी मुख्य अतिथि और यूपी के विज्ञान एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री योगेन्द्र उपाध्याय विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए।

एसएसयू के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया और उनके सामने विश्वविद्यालय की उपलब्धियां प्रस्तुत कीं। दीक्षांत समारोह में छात्र और छात्राओं सहित कुल 14167 छात्र-छात्राओं को डिग्री और प्रमाण पत्र दिए गये। इनमें 30 मेधावी विद्यार्थियों को विभिन्न पाठ्यक्रमों की परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने पर 30 स्वर्ण पदक सहित 59 स्वर्ण पदक प्रदान किये गये। दीक्षांत समारोह में बोलते हुए राज्यपाल ने कहा कि डिजिटल शिक्षा समय की मांग है जिसमें एसएसयू द्वारा शुरू किया गया ऑनलाइन संस्कृत पाठ्यक्रम काफी मदद करेगा।

उन्‍होंने कहा कि भारत को महाशक्ति बनाने के लिए हमें हर क्षेत्र में आगे बढ़ना होगा। हम विकास करते हुए अपनी विरासत को संरक्षित कर रहे हैं। भारत को आगे ले जाने के लिए अगले 25 साल बहुत महत्वपूर्ण हैं जिसमें युवाओं को योगदान देना होगा। राज्‍यपाल ने कहा-“जातिवाद शिक्षित लोगों में सबसे अधिक प्रचलित है। हमें जातिवाद से बाहर निकलना होगा, तभी हम अपने देश को आगे ले जा सकेंगे।”

उन्होंने महिलाओं और छात्राओं द्वारा संस्कृत में पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे हमारी ज्ञान परंपरा विश्व में फैलेगी। उन्होंने काशी को न्याय की भूमि बताया। कहा कि पिछले 250 वर्षों में इस विश्वविद्यालय ने भारत को कई विद्वान दिये हैं। पिछले 20 वर्षों के दौरान विश्वविद्यालय की छवि धूमिल होने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सभी के संयुक्त प्रयासों से विश्वविद्यालय नई ऊंचाइयां हासिल करने और अपना गौरव बहाल करने में सक्षम होगा। 

समारोह के मुख्य अतिथि प्रोफेसर वरखेड़ी ने विद्वानों से कहा कि छात्रों को अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रकाशन से पहले उचित शोध करें और विषयों का गहन अध्ययन करें। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति राष्ट्र द्वारा स्वीकृत शिक्षा दस्तावेज है और इसे सभी घरों तक पहुंचाना हम शिक्षकों का कर्तव्य है। प्रोफेसर वरखेड़ी ने सभी से संस्कृत के कल्याण के लिए प्रयास करने की अपील करते हुए अपना भाषण समाप्त किया।

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