दीपावली की चकाचौंध और रोशनी के बाद जब शहर नींद से जागा, तो हवा में जश्न नहीं — जहर तैर रहा था। दिल्ली–NCR के साथ-साथ गाजियाबाद की हवा भी अब ‘मारक’ श्रेणी में पहुंच गई है। शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 300 के पार दर्ज हुआ, जो सीधा संकेत है कि हम अपनी ही बनाई प्रदूषित दुनिया में सांस लेने को मजबूर हैं।
आंखों में जलन, गले में खराश और सीने में भारीपन… यह अब किसी बीमारी के लक्षण नहीं, बल्कि हमारे शहर की रोजमर्रा की सच्चाई बन चुके हैं। दीपावली की रात छोड़े गए पटाखों ने जो धुआं फैलाया, उसने गाजियाबाद को एक गैस चैंबर में बदल दिया है।
स्वास्थ्य विभाग ने एडवाइजरी जारी कर दी है — बिना जरूरी काम घर से बाहर न निकलें, बाहर निकलें तो मास्क पहनें। पर सवाल यह है कि क्या हम अब अपने ही शहर में कैद होकर जीने को मजबूर हैं? क्या हर साल दीवाली के बाद हमें यही संदेश पढ़ना होगा — “घर में रहें, हवा जहरीली है”?
राजनगर, कौशांबी और वसुंधरा जैसे इलाकों में हालात और भी भयावह हैं। यहां AQI 330–340 के बीच पहुंच गया है। ये वही क्षेत्र हैं जहां ट्रैफिक, निर्माण धूल और पटाखों का धुआं मिलकर एक घातक मिश्रण बना रहे हैं।
हर साल की तरह सरकारें पानी का छिड़काव और एंटी-स्मॉग गन लगाने का दावा करती हैं, लेकिन नतीजा वही — ‘सांसों पर सजा’। यह लड़ाई अब केवल प्रशासन की नहीं, समाज की भी है। जब तक हम अपनी आदतें नहीं बदलेंगे, यह जहरीली हवा हमारे बच्चों के भविष्य को निगलती रहेगी।
पटाखों से प्रदूषण, वाहनों का धुआं, खुले में कचरा जलाना और निर्माण स्थलों की अनियंत्रित धूल — यही चार ‘अपराधी’ हैं जो हर दीवाली के बाद लौटकर आते हैं।
जिला चिकित्साधिकारी डॉ. नीरज सक्सेना के मुताबिक, “बच्चों, बुजुर्गों और दमा से पीड़ित लोगों को फिलहाल घर में ही रहना चाहिए। प्रदूषण से आंख, फेफड़े और हृदय सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।”
पर क्या केवल मास्क पहनकर या पानी पीकर हम इस संकट से बच सकते हैं? जवाब है — नहीं। यह सामूहिक जिम्मेदारी का प्रश्न है।
विकास की परिभाषा अब केवल सड़कों, इमारतों और निवेश से नहीं मापी जानी चाहिए। सच्चा विकास वह है जहाँ बच्चे बिना खांसे स्कूल जा सकें और बुजुर्ग बिना दवाई के सांस ले सकें।
गाजियाबाद, नोएडा और दिल्ली का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करता है कि हम ‘विकास’ की नहीं, ‘वायु’ की राजनीति कब शुरू करते हैं।
त्योहार खत्म हो गया है, लेकिन त्यौहार का धुआं अब तक हमारे सिर पर मंडरा रहा है।
सरकारों को चाहिए कि वे इस मौसमी चेतावनी को स्थायी नीति में बदलें — ग्रीन फेस्टिवल गाइडलाइन, इलेक्ट्रिक वाहन अनिवार्यता, और प्रदूषण नियंत्रण की जवाबदेही तय की जाए।
क्योंकि यह लड़ाई केवल आंखों की जलन की नहीं, हमारे अस्तित्व की लड़ाई है।
अब वक्त है कि हम पटाखों की नहीं, साफ हवा की दीवाली मनाना सीखें।






