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Friday, April 10, 2026

‘माफिया-शिक्षक’ डब्बन : फरार, इनामी और जेल यात्रा के बीच भी निकलता रहा वेतन

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– कौन कर रहा था हाजिरी फाइनल?
– आखिर किसका वरदहस्त?
फर्रुखाबाद। शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न केवल बेसिक शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि ‘जीरो टोलरेंस’ की नीति को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि माफिया अनुपम दुबे का गैंगस्टर भाई अनुराग दुबे उर्फ डब्बन, जो मोहम्मदाबाद क्षेत्र के श्याम जनता जूनियर हाई स्कूल ईश्वरी सिंनौडा मोहम्मदाबाद में सरकारी शिक्षक के पद पर तैनात है, वर्षों तक स्कूल नहीं गया—इसके बावजूद उसका वेतन लगातार निकलता रहा।
सूत्रों के मुताबिक, माफिया अनुपम दुबे का भाई अनुराग दुबे डब्बन लंबे समय तक फरार रहा और उस पर ₹50,000 का इनाम भी घोषित किया गया था। बाद में गिरफ्तारी हुई, जेल गया और फिर जमानत पर रिहा हुआ, लेकिन इन तमाम परिस्थितियों के बावजूद वह कभी विद्यालय में पढ़ाने नहीं पहुंचा। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब वह फरार था या जेल में था, तब उसकी उपस्थिति कैसे दर्ज होती रही? किसके आदेश पर हर महीने वेतन पास होता रहा?
स्थानीय लोगों का कहना है कि विद्यालय में बच्चों को शिक्षक की कमी झेलनी पड़ रही है, जबकि कागजों में सब कुछ सामान्य दिखाया जा रहा है। इससे साफ संकेत मिलता है कि कहीं न कहीं विभागीय स्तर पर मिलीभगत से पूरा खेल चल रहा है। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग का गंभीर मामला बनता जा रहा है।
चौंकाने वाली बात यह भी है कि इससे पहले भी माफिया से जुड़े शिक्षकों की नियुक्ति और शैक्षिक अभिलेखों की जांच की बातें सामने आई थीं, लेकिन कार्रवाई आज तक ठंडे बस्ते में पड़ी है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किसके संरक्षण में यह पूरा तंत्र चल रहा है? क्या विभाग के जिम्मेदार अधिकारी जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं या फिर कहीं ऊपर तक ‘सेटिंग’ का खेल जारी है?
इस पूरे प्रकरण ने शिक्षा विभाग की पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर एक इनामी और फरार आरोपी भी सरकारी वेतन ले सकता है, तो फिर व्यवस्था की साख पर सवाल उठना लाजिमी है।
अब क्षेत्रीय लोगों और जागरूक नागरिकों की मांग है कि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, दोषी अधिकारियों को चिन्हित कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो और अब तक निकले वेतन की रिकवरी की जाए। यदि इस मामले में सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह सिर्फ एक स्कूल या एक शिक्षक का मामला नहीं रहेगा, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी का प्रतीक बन जाएगा।

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