आलू की मंदी, बाढ़ का कहर और अब खाद का संकट अन्नदाता कब तक भुगतेगा
प्रशांत कटियार
उत्तर प्रदेश का किसान आज सबसे असहाय और बेबस दिखाई दे रहा है। कभी बारिश में भीगते हुए लाइन में खड़ा, तो कभी तपती धूप में पसीना बहाते हुए, कभी पुलिस की लाठियां खाते हुए, तो कभी नियमों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ हर जगह वही नजर आता है। दुकानों पर कतारें लगाता किसान जब खाली हाथ घर लौटता है तो उसके सीने का दर्द अखबार की सुर्खियों तक तो पहुंच जाता है, लेकिन सत्ता के गलियारों तक नहीं।कभी समितियों के सचिवों की मनमानी, कभी खास लोगों को मिली विशेष सुविधा, तो कभी कालाबाजारी की मिलीभगत हर मोड़ पर किसान ठगा जाता है। सरकार की आधार कार्ड व्यवस्था भी किसानों का दर्द कम करने की बजाय कालाबाजारियों के लिए सोने की खान साबित हो रही है। यही कारण है कि किसान आज भी अपने हक की खाद पाने के लिए जिल्लत झेल रहा है।विडंबना यह है कि किसान जिस खेत में पसीना बहाकर देश की थाली भरता है, उसी खेत के लिए खाद के इंतजाम में असफल हो जाता है। आलू की मंदी से लेकर बाढ़ के प्रकोप तक, हर मुसीबत किसान के सिर पड़ती है। लेकिन सत्ता और शासन की संवेदनशीलता उस तक कभी नहीं पहुंचती। किसान चाहे सड़क पर हो, लाइन में हो, या कर्ज के बोझ से दबकर अपने जीवन का अंत कर रहा हो उसका दर्द नेताओं की बयानबाजी और वादों में खोकर रह जाता है।आज प्रदेश में हालात यह हैं कि 266 रुपये की बोरी यूरिया नेपाल जाकर 1500 से 2000 रुपये में बिक रही है, लेकिन किसान को अपने खेत के लिए यह खाद नहीं मिल रही। सिद्धार्थनगर, बहराइच, महाराजगंज, लखीमपुर खीरी जैसे सीमावर्ती जिलों में यह तस्करी खुलेआम हो रही है और सरकार की कार्रवाई महज चेतावनी तक सिमटी है।यह वही सरकार है जिसने किसानों की आय दोगुनी करने का सपना दिखाया था। लेकिन हकीकत में किसान खाद को तरस रहा है, यहां पर यह जानना और जरूरी हो जाता है कि अगले महीने से आलू की बुवाई शुरू होनी है जहां किसानों को सबसे ज्यादा खाद की जरूरत होती है अभी यह स्थिति तो आगे क्या होगी यह किसी से छिपी नहीं है। आलू के दाम मिट्टी में मिल रहे है और धान की फसल खाद के संकट से सूख रही है। यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि किसानों के आत्मसम्मान और मेहनत पर चोट है।याद करना होगा कि जब आईएएस डॉ. हीरालाल ने किसानों के दर्द को समझते हुए गड़बड़ी करने बालो पर नकेल कसनी शुरू की थी, तो सिस्टम ने उन्हें ही पद से हटा दिया। यह घटना इस बात का प्रतीक है कि यहां किसानों की आवाज उठाने वालों को ही कुर्सी से बेदखल कर दिया जाता है।किसानों का धैर्य अब जवाब दे रहा है। उनका कहना है कि भाजपा सरकार में खाद के दाम तो बढ़े ही, अब कालाबाजारी और तस्करी ने पूरी तरह कमर तोड़ दी। किसानों की यह पीड़ा अगर लगातार अनसुनी होती रही तो 2027 विधानसभा चुनाव में यही अन्नदाता सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा फैसला सुनाएगा। सवाल साफ है जब किसान ही भूखा, कर्जदार और अपमानित होगा, तो सत्ता का सिंहासन आखिर किसके भरोसे टिकेगा
लेखक दैनिक यूथ इंडिया के स्टेट हेड हैं।


