तेहरान: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को 19 दिन हो चुके हैं, लेकिन इस बार हालात पहले से बिल्कुल अलग नजर आ रहे हैं। अमेरिका और इज़राइल को इस युद्ध में पारंपरिक सहयोगियों का समर्थन नहीं मिल पा रहा है, जिससे वैश्विक स्तर पर उनकी स्थिति कमजोर होती दिख रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुरुआत में सहयोगी देशों से मदद की अपील की थी, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाने के लिए। यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे अहम मार्ग माना जाता है और इसके बंद होने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, ट्रंप की इस अपील पर अब तक किसी भी बड़े सहयोगी देश ने सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी है। स्थिति ऐसी हो गई कि ट्रंप को सार्वजनिक रूप से यह कहना पड़ा कि उन्हें किसी सहयोगी देश की मदद की जरूरत नहीं है, जो उनकी कूटनीतिक निराशा को दर्शाता है।
नाटो और यूरोप के प्रमुख देशों—ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली—ने इस युद्ध से दूरी बना ली है। इन देशों का मानना है कि यह संघर्ष अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं है और इसमें शामिल होना जोखिम भरा हो सकता है।
स्पेन ने तो अमेरिका को अपने एयरबेस तक इस्तेमाल करने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया है। यह संकेत है कि यूरोप इस बार किसी भी सैन्य टकराव में सीधे शामिल नहीं होना चाहता।
एशिया में भी अमेरिका को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला है। जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे करीबी सहयोगियों ने भी अपने युद्धपोत भेजने से इनकार कर दिया है। इन देशों की चिंता मुख्य रूप से आर्थिक है, क्योंकि किसी भी बड़े युद्ध से तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच ईरान और इज़राइल के बीच हमले लगातार जारी हैं। इज़राइल ने ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारिजानी को मार गिराने का दावा किया है, जबकि ईरान ने भी संघर्ष जारी रखने के संकेत दिए हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर स्थिति और भी गंभीर हो गई है। ईरान की ओर से इसे बंद करने की चेतावनी के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप को केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर भी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका में बढ़ती महंगाई और कमजोर जनसमर्थन उनके लिए चुनौती बन रहे हैं, जिसके चलते वे इस युद्ध को लेकर ज्यादा आक्रामक रणनीति अपनाने से बच रहे हैं।
कई देशों का यह भी मानना है कि यह युद्ध बिना व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति के शुरू किया गया है। इसलिए वे इसमें शामिल होकर अपनी कूटनीतिक स्थिति और रणनीतिक संतुलन को खतरे में नहीं डालना चाहते।
इस पूरे परिदृश्य ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक राजनीति में पुराने गठबंधन अब पहले जैसे मजबूत नहीं रहे। अमेरिका को इस बार अपने सहयोगियों का वैसा समर्थन नहीं मिल रहा, जैसा पहले के संघर्षों में देखने को मिलता था।
अगर जल्द कूटनीतिक प्रयास नहीं किए गए, तो यह संघर्ष और बड़ा रूप ले सकता है। फिलहाल दुनिया के बड़े देश स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, लेकिन सीधे हस्तक्षेप से बच रहे हैं।
इस बीच यह भी साफ हो गया है कि बदलते वैश्विक समीकरणों में अब हर देश अपने हितों को प्राथमिकता दे रहा है, और यही कारण है कि अमेरिका इस युद्ध में अपेक्षाकृत अकेला नजर आ रहा है।


