लखनऊ। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने गायों के मुद्दे पर राजनीतिक विरोधियों को घेरते हुए एक बार फिर सियासी बहस को तेज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समाजवादी परिवार का गायों से गहरा और भावनात्मक जुड़ाव है, जो किसी चुनावी एजेंडे या राजनीतिक दिखावे पर आधारित नहीं, बल्कि पारिवारिक परंपरा और संस्कृति का हिस्सा है।
अखिलेश यादव ने कहा,
“हमें गायों से बड़ा लगाव है। हमारे घरों में सबसे ज्यादा गाय हैं। यह आज की बात नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा हमारा संस्कार है।”
विरोधियों पर तीखा हमला
अपने बयान के जरिए अखिलेश यादव ने सीधे तौर पर उन राजनीतिक दलों को निशाने पर लिया, जो गाय और गौ-रक्षा के नाम पर राजनीति करने का आरोप समाजवादी पार्टी पर लगाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग केवल मंचों से गाय की बात करते हैं, वही जमीन पर गोवंश की दुर्दशा के जिम्मेदार हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि—
यदि गौ-प्रेम इतना ही सच्चा है, तो सड़कों पर घूमती गायें क्यों नजर आ रही हैं?
किसानों की फसलें गोवंश से क्यों उजड़ रही हैं?
गौशालाओं की हालत बदहाल क्यों है?
सपा प्रमुख ने कहा कि गाय को आस्था का विषय बताने वाले दलों ने इसे राजनीतिक हथियार बना दिया है। परिणामस्वरूप, गोवंश संरक्षण के नाम पर घोषणाएं तो खूब हुईं, लेकिन व्यवस्थाएं कमजोर साबित हुईं। उन्होंने कहा कि असली गौ-सेवा वही है, जिसमें गाय सुरक्षित रहे, किसान परेशान न हो और गौशालाएं कागजों तक सीमित न रहें।
सपा की परंपरा का किया उल्लेख
अखिलेश यादव ने दावा किया कि समाजवादी विचारधारा में हमेशा पशुपालन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्रकृति के संरक्षण को महत्व दिया गया है। उन्होंने कहा कि सपा सरकार के कार्यकाल में पशुपालन और गौशालाओं से जुड़े कार्यों पर ध्यान दिया गया था और आने वाले समय में भी पार्टी इस दिशा में ठोस नीति के साथ आगे बढ़ेगी।
सियासत में गरमाया गाय का मुद्दा
अखिलेश यादव के इस बयान के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में गाय और गौ-संरक्षण को लेकर बहस और तेज हो गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बयान केवल जवाबी हमला नहीं, बल्कि उस नैरेटिव को चुनौती देने की कोशिश है, जिसमें गाय के मुद्दे पर समाजवादी पार्टी को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है।
अपने बयान के जरिए अखिलेश यादव ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि गाय केवल राजनीति का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। साथ ही उन्होंने यह भी साफ किया कि सच्चा गौ-प्रेम भाषणों से नहीं, बल्कि जमीनी व्यवस्था और ईमानदार नीयत से साबित होता है।


