– दलित छात्रों के लिए आरक्षित सीमित संसाधनों पर ही हस्तक्षेप क्यों ?
– सामान्य और पिछड़े वर्ग के छात्रों से सामाजिक और सांस्कृतिक टकराव की संभावना
– अनुसूचित जाति/जनजाति छात्रावासों में साझा व्यवस्था पर बवाल
गोरखपुर: उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों (students) के लिए बनाए गए छात्रावासों में अब सामान्य और पिछड़े वर्ग के छात्रों को भी प्रवेश दिए जाने के आदेश का कड़ा विरोध शुरू हो गया है। समाज कल्याण विभाग द्वारा 1 अगस्त 2025 को जारी आदेश के तहत प्रदेश के सभी जिलों में संचालित अनुसूचित जाति/जनजाति छात्रावासों (dalit hostels) में 30 प्रतिशत सीटें सामान्य और पिछड़े वर्ग के छात्रों को आवंटित करने के निर्देश दिए गए हैं। इस फैसले के खिलाफ अब दलित संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है और इसे दलित छात्रों के अधिकारों पर सीधा हमला बताया जा रहा है।
अम्बेडकर जन मोर्चा के मुख्य संयोजक श्रवण कुमार निराला ने प्रमुख सचिव, समाज कल्याण विभाग को पत्र लिखकर आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह छात्रावास विशेष रूप से अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के लिए बनाए गए हैं, जिनकी सामाजिक और शैक्षिक स्थिति लंबे समय से कमजोर रही है। इन छात्रावासों में रहकर लाखों दलित छात्र-छात्राएं अब तक डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और अन्य क्षेत्रों में सफल करियर बना चुके हैं। लेकिन अब इस फैसले से उनके लिए सुरक्षित और सहयोगी माहौल खत्म हो जाएगा।
पत्र में यह भी कहा गया है कि छात्रावासों में जातिगत विविधता लाने से सामाजिक और सांस्कृतिक टकराव की संभावना बढ़ेगी। दलित छात्र जहां बाबा साहब डॉ. अंबेडकर को अपना मार्गदर्शक मानते हैं और ‘जय भीम’ जैसे अभिवादन के साथ आपसी पहचान बनाते हैं, वहीं सामान्य और पिछड़े वर्ग के छात्र हमेशा इसे सहज नहीं मानते। इससे छात्रावासों के भीतर असहमति, संघर्ष और जातिगत गोलबंदी जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं, जो शैक्षिक माहौल को पूरी तरह बर्बाद कर देंगी।
श्रवण कुमार निराला ने पत्र में इस बात पर भी जोर दिया कि सामान्य और पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए पहले से ही अन्य विकल्प उपलब्ध हैं, जबकि दलित छात्रों के लिए ये छात्रावास ही एकमात्र सहारा हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर दलित छात्रों के लिए आरक्षित सीमित संसाधनों पर ही हस्तक्षेप क्यों किया जा रहा है।
उन्होंने शासन से मांग की है कि इस आदेश को तुरंत रद्द किया जाए और अनुसूचित जाति व जनजाति छात्रावासों की संरचना और उद्देश्य को सुरक्षित रखा जाए। साथ ही चेतावनी दी कि यदि इस पर पुनर्विचार नहीं हुआ तो पूरे प्रदेश में विरोध-प्रदर्शन तेज किया जाएगा। मामला केवल आवास का नहीं, बल्कि दलित समाज की शिक्षा, गरिमा और आत्मनिर्भरता से जुड़ा है, जिसे किसी भी हाल में कमजोर नहीं होने दिया जाएगा।