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Sunday, March 29, 2026

सब्जियों का राजा बना किसानों के लिए बोझ, आलू ने तोड़ दी कमर,कौड़ियों के दाम, खेतों में ही बर्बाद हो रही किसानों की मेहनत

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प्रशांत कटियार

फर्रुखाबाद| जिले में इस बार आलू की पैदावार भले ही मध्यम हुई हो, लेकिन बाजार में मिल रहे बेहद कम दामों ने किसानों की उम्मीदों को पूरी तरह तोड़ दिया है। जिसे कभी सब्जियों का राजा कहा जाता था, वही आलू इस बार किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गया है। खेतों में दिन रात मेहनत, महंगे बीज, खाद और सिंचाई पर बढ़ती लागत के बावजूद किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा। हालात इतने खराब हैं कि किसान अपनी फसल को कोल्ड स्टोरेज तक पहुंचाने के बाद भी बेचने को लेकर असमंजस और चिंता में डूबे हुए हैं।
फर्रुखाबाद जिले में इस बार करीब 42,950 हेक्टेयर भूमि पर आलू की खेती की गई, जिससे लगभग 15.85 लाख मीट्रिक टन उत्पादन हुआ। इतनी बड़ी पैदावार के बावजूद किसानों के चेहरे पर खुशी नहीं, बल्कि मायूसी साफ झलक रही है। जिले के कई किसान बताते हैं कि शुरू से ही बाजार में भाव नहीं मिले, जिसके चलते कुछ किसानों ने तो अपनी खड़ी फसल को खेतों में ही जोत दिया। वहीं जब मंडियों में आलू लेकर पहुंचे तो वहां भी हालात निराशाजनक रहे—कई किसान सातनपुर मंडी से बिना बिक्री के ही वापस लौटने को मजबूर हो गए।
स्थिति और भी चिंताजनक तब हो गई जब छोटे आकार के आलू का कोई खरीदार ही नहीं मिला। बड़े आलू के दाम भी इतने कम हैं कि किसानों के लिए लागत निकालना तक मुश्किल हो गया है। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार आलू के दामों में 50% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है। व्यापारी भी सीमित खरीद कर रहे हैं, जिससे बाजार में प्रतिस्पर्धा और कम हो गई है।
किसानों की परेशानी के पीछे कई वजहें सामने आ रही हैं। इस बार पश्चिम बंगाल, बिहार और पंजाब के कुछ जिलों में भी आलू का बंपर उत्पादन हुआ है, जिससे बाजार में आपूर्ति बढ़ गई और दाम गिर गए। दूसरी ओर बिहार, झारखंड और नेपाल से अपेक्षित मांग नहीं आ रही, जिससे स्थानीय बाजारों पर दबाव और बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हालात अनुकूल नहीं हैंअमेरिका, इजराइल और ईरान जैसे देशों के बीच चल रहे तनाव का असर निर्यात पर पड़ा है, जिससे किसानों की उम्मीदें और कमजोर हो गई हैं।
जिले में मौजूद 113 कोल्ड स्टोरेज में करीब 10.97 लाख मीट्रिक टन भंडारण क्षमता है, जो पूरी होने की कगार पर है। कोल्ड स्टोरेज का किराया, ढुलाई और रखरखाव का खर्च इतना अधिक है कि किसानों के लिए यह भी एक अतिरिक्त बोझ बन गया है। कई किसान बताते हैं कि छह महीने तक आलू स्टोर करने के बाद भी बोरे और भाड़े का खर्च तक नहीं निकल पाता, ऐसे में फसल को सड़ने के लिए छोड़ देना मजबूरी बन जाती है।
फर्रुखाबाद, इटावा और कन्नौज जैसे जिलों में हालात इतने खराब हैं कि कई किसानों ने आलू की खुदाई करने के बजाय उसे खेतों में ही जोत दिया। यह दृश्य न सिर्फ किसानों की आर्थिक बदहाली को दर्शाता है, बल्कि कृषि व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
हताश और परेशान किसानों ने अब प्रशासन और सरकार से गुहार लगाई है कि आलू की खरीद की गारंटी दी जाए या न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाए। किसानों का कहना है कि यदि सरकार ने जल्द ही हस्तक्षेप नहीं किया, सब्सिडी या बाजार की बेहतर व्यवस्था नहीं की, तो क्षेत्र का अन्नदाता पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा।
आज हालात यह हैं कि जिस आलू को किसान कभी नकदी फसल मानते थे, वही अब उनके लिए चिंता और नुकसान का कारण बन गया है। सवाल यह है कि आखिर “सब्जियों के राजा” की यह दुर्दशा कब खत्म होगी, और कब किसानों को उनकी मेहनत का सही मूल्य मिल पाएगा।

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