फर्रुखाबाद। जनपद के ग्रामीण क्षेत्रों में इस समय किसान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। आलू की कम पैदावार और बाजार में बिक्री मूल्य में आई भारी गिरावट ने किसानों की कमर तोड़ दी है। उत्पादन घटने के साथ-साथ दामों में आई गिरावट के कारण किसानों को लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। स्थिति यह है कि कई किसान कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं और अगली फसल की तैयारी को लेकर असमंजस में हैं।
स्थानीय किसानों के अनुसार इस बार मौसम की मार, समय पर सिंचाई न होना और बढ़ती लागत ने आलू की पैदावार को प्रभावित किया है। विशेषकर चिपसोना किस्म के आलू की पैदावार में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। पिछले वर्ष जहां प्रति बीघा 50 से 52 पैकेट तक उत्पादन हो रहा था, वहीं इस बार यह घटकर मात्र 40 से 45 पैकेट रह गया है। उत्पादन में करीब 15 से 20 प्रतिशत की कमी ने किसानों की आय पर सीधा असर डाला है।
सिर्फ पैदावार ही नहीं, बल्कि बाजार में कीमतों में भी भारी गिरावट आई है। कोरापुर निवासी किसान लोधी मोहन सिंह ने बताया कि पिछले वर्ष चिपसोना आलू 650 से 780 रुपये प्रति पैकेट के हिसाब से बिका था, जिससे लागत निकलने के साथ कुछ मुनाफा भी हो जाता था। लेकिन इस वर्ष वही आलू 350 से 400 रुपये प्रति पैकेट के बीच बिक रहा है। कई बार तो खरीददार भी नहीं मिल रहे, जिससे किसान औने-पौने दामों पर फसल बेचने को मजबूर हैं।
किसानों का कहना है कि बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ रही है। एक बीघा आलू की खेती में हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं, लेकिन जब बिक्री मूल्य आधा रह जाए तो घाटा होना तय है। कई किसानों ने आलू को कोल्ड स्टोरेज में रखने का विकल्प चुना है, लेकिन वहां भी भंडारण शुल्क और अन्य खर्च अलग से बोझ बढ़ा रहे हैं।
इस आर्थिक तंगी का असर किसानों के सामाजिक और पारिवारिक जीवन पर साफ दिखाई दे रहा है। परिवारों की माली हालत बिगड़ने से बच्चों की पढ़ाई, दवाइयों और दैनिक जरूरतों को पूरा करना कठिन हो गया है। शादी-विवाह जैसे सामाजिक कार्यक्रम भी टल रहे हैं। कुछ किसान साहूकारों और बैंकों से लिया गया कर्ज चुकाने को लेकर चिंतित हैं।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में मांग और आपूर्ति के असंतुलन के कारण कीमतें गिरी हैं। वहीं किसान सरकार से समर्थन मूल्य तय करने या बाजार हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं ताकि उन्हें न्यूनतम लाभ सुनिश्चित हो सके। किसानों ने प्रशासन से राहत पैकेज, फसल बीमा भुगतान और उचित मूल्य दिलाने की व्यवस्था की मांग की है।
फिलहाल आलू उत्पादक किसान भविष्य की फसल को लेकर भी असमंजस में हैं। यदि यही स्थिति रही तो कई किसान अगली बार आलू की खेती कम कर सकते हैं, जिससे क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

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