भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने 1 अक्टूबर से आधार अपडेट शुल्क में बढ़ोतरी की घोषणा की है। बायोमीट्रिक अपडेट, जो पहले 100 रुपये में किया जाता था, अब 25 रुपये महंगा होकर 125 रुपये में होगा। यह नियम विशेष रूप से 7 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों पर सीधा प्रभाव डालेगा, क्योंकि इस आयु में बायोमीट्रिक अपडेट अनिवार्य होता है।
सवाल यह है कि क्या इस बढ़ोतरी का समय सही है? देश पहले ही महंगाई, रोजमर्रा की वस्तुओं के बढ़ते दाम और बेरोजगारी जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में पहचान पत्र जैसे जरूरी दस्तावेज पर अतिरिक्त बोझ डालना आमजन के लिए असुविधा ही बढ़ाएगा।
आधार को आज बैंक खाता खोलने से लेकर राशन, गैस, पेंशन और छात्रवृत्ति तक हर सेवा के लिए अनिवार्य बना दिया गया है। अगर इसमें समय पर अपडेट न हो तो नागरिक कई सरकारी व वित्तीय सुविधाओं से वंचित हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आधार अपडेट न कराने की स्थिति में भविष्य में कई तरह की परेशानियां सामने आ सकती हैं। ऐसे में आम नागरिकों के पास विकल्प नहीं बचता और उन्हें चाहे-अनचाहे यह अतिरिक्त शुल्क देना ही पड़ेगा।
यह सच है कि तकनीकी रखरखाव, डाटा सुरक्षा और सर्विस डिलीवरी पर खर्च बढ़ा है। लेकिन क्या इसका सीधा भार जनता पर डालना उचित है? खासतौर पर तब, जब अधिकांश सेवाएं ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं और उनका शुल्क जस का तस रखा गया है। सरकार को चाहिए कि वह ऑफलाइन अपडेट कराने वालों की स्थिति को भी समझे—ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, जिनके पास इंटरनेट की पहुंच नहीं है या डिजिटल सुविधा की समझ नहीं है, वही इस बढ़ोतरी से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि आधार का दायरा लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अपेक्षा थी कि सरकार आधार सेवाओं को और सुलभ और किफायती बनाए, न कि इसे महंगा करे। जनता से यह अपील करना कि वे 1 अक्टूबर से पहले अपने आधार अपडेट करा लें, दरअसल दबाव की नीति प्रतीत होती है।
संपादकीय दृष्टि से यह कहना उचित होगा कि सरकार और यूआईडीएआई को इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। यदि शुल्क बढ़ाना ही हो तो इसके लिए चरणबद्ध व्यवस्था बनाई जा सकती है या फिर ग्रामीण और निम्न आय वर्ग को छूट दी जा सकती है। आखिरकार, पहचान हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है—इसे महंगा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना के खिलाफ है।






