एटा
जनपद से आस्था, त्याग और वैराग्य की एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने पूरे क्षेत्र को भावुक कर दिया है। यहां एक ही परिवार के बेटे के बाद माता और पिता ने भी सांसारिक जीवन का त्याग कर जैन धर्म के मार्ग को अपना लिया। यह अनोखी घटना न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि समाज के लिए एक मिसाल भी बन गई है।
एटा शहर के डॉक्टर लोकमान्य दास तिराहा स्थित सुंदरलाल स्ट्रीट निवासी प्रशांत जैन ने भगवान महावीर की शिक्षाओं से प्रभावित होकर कम उम्र में ही वैराग्य का मार्ग चुन लिया। बताया जाता है कि वर्ष 2009 में एटा आगमन पर आचार्य विमर्श सागर महाराज के सानिध्य में आने के बाद उनके जीवन की दिशा ही बदल गई। उन्होंने अपनी बीकॉम की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और मुनि दीक्षा लेकर ‘मुनि विव्रत सागर’ बन गए।
पुत्र के इस निर्णय ने परिवार को पहले तो भावुक किया, लेकिन धीरे-धीरे माता-पिता भी आध्यात्मिक मार्ग की ओर आकर्षित हो गए। बेटे के वैराग्य से प्रेरित होकर पिता मुकुल जैन ने भी गृहस्थ जीवन का त्याग कर मुनि दीक्षा ग्रहण की और ‘मुनि विश्वांक सागर’ के रूप में अपना नया जीवन प्रारंभ किया। इसके बाद मां सुमन जैन ने भी सांसारिक मोह-माया को छोड़कर वैराग्य मार्ग अपना लिया।
इस प्रकार, एक ही परिवार के तीनों सदस्यों ने जीवन के भौतिक सुख-साधनों को त्याग कर आत्मिक शांति और धर्म के मार्ग को अपनाया। यह घटना समाज में चर्चा का विषय बनी हुई है और लोग इसे अद्भुत त्याग और समर्पण का उदाहरण मान रहे हैं।
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि इस प्रकार का वैराग्य अत्यंत दुर्लभ होता है, जब पूरा परिवार एक साथ सांसारिक जीवन को त्यागकर आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का निर्णय ले। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह परिवार अब समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है और उनके इस कदम से युवाओं में भी आध्यात्मिकता के प्रति रुचि बढ़ रही है।
यह कहानी यह संदेश देती है कि सच्ची आस्था और आत्मिक संतोष के लिए व्यक्ति को कभी-कभी बड़े से बड़ा त्याग भी करना पड़ता है, और जब संकल्प दृढ़ हो तो पूरा जीवन ही एक नई दिशा में बदल सकता है।


