14 C
Lucknow
Friday, January 30, 2026

उच्च शिक्षा में समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम: UGC के नए विनियम, 2026

Must read

भारत में उच्च शिक्षा (higher education) केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समान अवसर और समावेशी विकास का भी एक महत्वपूर्ण आधार है। इसी संदर्भ में हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने हेतु विनियम, 2026” अधिसूचित किए गए हैं। इन विनियमों का उद्देश्य देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेज परिसरों में व्याप्त जाति-आधारित भेदभाव को रोकना और एक सुरक्षित, समान एवं गरिमामय शैक्षणिक वातावरण सुनिश्चित करना है।

नए विनियमों की पृष्ठभूमि और आवश्यकता

UGC द्वारा यह नई नियमावली 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित की गई, जो वर्ष 2012 से लागू भेदभाव-रोधी विनियमों का अद्यतन स्वरूप है। पिछले कुछ वर्षों में उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव, उत्पीड़न और असमान व्यवहार से जुड़े कई मामले सामने आए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि पुराने नियम वर्तमान सामाजिक वास्तविकताओं को पूरी तरह संबोधित करने में सक्षम नहीं थे।

वर्ष 2025 में UGC ने इन नियमों का एक मसौदा सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया था। हालाँकि, उस मसौदे को लेकर कई आपत्तियाँ सामने आईं। विशेष रूप से यह आलोचना की गई कि:
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा से बाहर रखा गया था,
भेदभाव की परिभाषा अस्पष्ट थी,
तथा झूठी शिकायतों को हतोत्साहित करने के नाम पर जुर्माने का प्रावधान प्रस्तावित किया गया था।
इन आलोचनाओं को ध्यान में रखते हुए UGC ने अंतिम अधिसूचित नियमों में महत्वपूर्ण संशोधन किए, जिससे यह नियमावली अधिक समावेशी और न्यायसंगत बन सकी।
नवीन संशोधित नियमावली के प्रमुख प्रावधान
1. जाति-आधारित भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा
नए विनियमों में ‘जाति-आधारित भेदभाव’ का अर्थ स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। इसके अंतर्गत अब:
अनुसूचित जाति (SC),
अनुसूचित जनजाति (ST),
तथा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)
के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर किया गया कोई भी भेदभाव शामिल होगा। OBC को इस दायरे में शामिल करना सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
2. भेदभाव की व्यापक और समावेशी परिभाषा
नियमावली में भेदभाव को केवल प्रत्यक्ष उत्पीड़न तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसमें प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के भेदभाव को शामिल किया गया है।

धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान, विकलांगता या इनसे संबंधित किसी भी आधार पर किसी हितधारक (छात्र, शिक्षक या कर्मचारी) के साथ किया गया अनुचित, भिन्न या पक्षपातपूर्ण व्यवहार भेदभाव की श्रेणी में आएगा।
इसके अतिरिक्त, वर्ष 2012 के विनियमों से प्रेरित परिभाषा के अनुसार, ऐसा कोई भी भेद, बहिष्कार या प्रतिबंध जो:
शिक्षा में समान व्यवहार को बाधित करे, या
किसी व्यक्ति या समूह की मानवीय गरिमा के प्रतिकूल हो,
भेदभाव माना जाएगा।
हालाँकि, 2012 के विनियमों के दो विशिष्ट प्रावधानों को इस बार शामिल नहीं किया गया है—जैसे अलग-अलग समूहों के लिए पृथक शैक्षणिक संस्थानों पर रोक और प्रवेश प्रक्रिया में SC/ST के विरुद्ध विशिष्ट भेदभाव की विस्तृत सूची।
समान अवसर केंद्र (EOC) और इक्विटी कमेटी
नए विनियमों के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centre – EOC) की स्थापना अनिवार्य कर दी गई है। इसका मुख्य उद्देश्य संस्थानों में सभी सामाजिक वर्गों के लिए समान अवसर, भागीदारी और समावेशन सुनिश्चित करना है।
EOC के अंतर्गत एक इक्विटी कमेटी गठित की जाएगी:
जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे,
जिसमें SC, ST, OBC, महिलाओं और दिव्यांगजनों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा।
इक्विटी कमेटी को:
वर्ष में कम-से-कम दो बार बैठक करनी होगी,
अर्द्धवार्षिक रिपोर्ट तैयार करनी होगी,
तथा EOC की कार्यप्रणाली पर वार्षिक रिपोर्ट UGC को प्रस्तुत करनी होगी।
राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी तंत्र
नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए UGC एक राष्ट्रीय स्तर की निगरानी समिति का गठन करेगा। इस समिति में:
वैधानिक पेशेवर परिषदों और आयोगों के प्रतिनिधि,
तथा नागरिक समाज के सदस्य शामिल होंगे।
यह समिति:
वर्ष में न्यूनतम दो बार बैठक करेगी,
नियमों के अनुपालन की समीक्षा करेगी,
भेदभाव से जुड़े मामलों की जाँच करेगी,
और भविष्य में रोकथाम के लिए सुझाव देगी।
संस्थानों की जिम्मेदारी और दंडात्मक प्रावधान
नवीन नियमावली के अनुसार उच्च शिक्षा संस्थानों पर यह स्पष्ट जिम्मेदारी डाली गई है कि वे:
भेदभाव को समाप्त करें,
समानता को बढ़ावा दें,
और आवश्यक निवारक एवं सुधारात्मक कदम उठाएँ।
संस्थान प्रमुख को नियमों के पालन की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी दी गई है।
यदि कोई संस्थान इन नियमों का पालन करने में विफल रहता है, तो UGC द्वारा:
उसे विभिन्न UGC योजनाओं से वंचित किया जा सकता है,
डिग्री, डिस्टेंस लर्निंग और ऑनलाइन कार्यक्रम संचालित करने से रोका जा सकता है, उसे UGC की मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची से हटाया भी जा सकता है।

UGC का संवैधानिक और संस्थागत महत्व

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक संस्था है, जिसकी स्थापना वर्ष 1956 में संसद के एक अधिनियम द्वारा की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य विश्वविद्यालय शिक्षा को बढ़ावा देना, समन्वय स्थापित करना तथा शिक्षण, परीक्षा और अनुसंधान के मानकों को सुनिश्चित करना है। इसके साथ-साथ UGC केंद्र और राज्य सरकारों को उच्च शिक्षा से जुड़े नीतिगत सुझाव भी देता है।

UGC के समानता विनियम, 2026 भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में सामाजिक न्याय और समावेशन को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हैं। OBC को भेदभाव की परिभाषा में शामिल करना, मजबूत निगरानी तंत्र स्थापित करना और कड़े दंडात्मक प्रावधानों का प्रावधान इन नियमों को अधिक प्रभावी बनाता है। यदि इनका ईमानदारी से क्रियान्वयन किया जाए, तो उच्च शिक्षा संस्थान वास्तव में समानता, गरिमा और अवसर की भावना को साकार कर सकते हैं।

लेखक~
दिव्या गंगवार
एम०ए० समाजशास्त्र
( लखनऊ विश्वविद्यालय)

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article