शरद कटियार
दिल्ली के एक बस कंडक्टर का मामला—जहां महज़ 5 पैसे के विवाद को लेकर लगभग 40 साल तक अदालतों में लड़ाई चलती रही—भारत की न्याय व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस आम भारतीय की वास्तविकता है जो न्याय के लिए वर्षों तक भटकता रहता है। रकम छोटी हो सकती है, लेकिन न्याय का सिद्धांत कभी छोटा नहीं होता।
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि न्याय मिलने में हुई देरी ने उस व्यक्ति के जीवन का एक बड़ा हिस्सा निगल लिया। जिस समय वह अपने अधिकार और सम्मान के लिए लड़ रहा था, उसी दौरान उसकी उम्र, ऊर्जा और संसाधन धीरे-धीरे खत्म होते चले गए। यही वह बिंदु है जहां यह मामला एक व्यक्तिगत संघर्ष से निकलकर पूरे सिस्टम की कमजोरी को उजागर करता है।
भारत की न्याय व्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी व्यवस्थाओं में गिनी जाती है, लेकिन इसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है—लंबित मामलों का पहाड़। 2025-26 तक देश में कुल लंबित मामलों की संख्या लगभग 5 करोड़ के आसपास पहुंच चुकी है। इनमें से करीब 4 करोड़ से अधिक मामले निचली अदालतों में लंबित हैं, जबकि लाखों मामले उच्च न्यायालयों और हजारों मामले भारत का सर्वोच्च न्यायालय में वर्षों से सुनवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
यह आंकड़े केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि हर एक संख्या के पीछे एक व्यक्ति, एक परिवार और एक अधूरी उम्मीद जुड़ी हुई है। न्याय में देरी का सबसे बड़ा कारण जजों की कमी है। भारत में प्रति 10 लाख आबादी पर जजों की संख्या बेहद सीमित है, जो विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। इसके अलावा बार-बार तारीखें पड़ना, प्रक्रियाओं की जटिलता और सरकारी विभागों द्वारा अनावश्यक अपीलें भी इस देरी को और बढ़ाती हैं।
न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति का सीधा असर आम नागरिक पर पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति लंबे समय तक केस लड़ने में सक्षम नहीं होता। उसे वकीलों की फीस, अदालतों के चक्कर और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। कई बार तो लोग न्याय की उम्मीद ही छोड़ देते हैं, जो लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
“जस्टिस डिलेयद इज जस्टिस देनीड ”—यह कहावत भारत में कई मामलों में सच्चाई बनती जा रही है। जब किसी को 30-40 साल बाद न्याय मिलता है, तो उसका वास्तविक महत्व काफी हद तक खत्म हो जाता है। कई मामलों में तो फैसले आने तक पीड़ित या आरोपी इस दुनिया में ही नहीं रहते।
हालांकि सरकार और न्यायपालिका ने इस समस्या को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। ई-कोर्ट, डिजिटल सुनवाई, फास्ट ट्रैक कोर्ट और लोक अदालत जैसी व्यवस्थाएं शुरू की गई हैं, जिससे कुछ मामलों में तेजी आई है। लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी व्यापक सुधार की जरूरत है।
जरूरत इस बात की है कि न्याय व्यवस्था को अधिक सरल, तेज़ और पारदर्शी बनाया जाए। जजों की संख्या बढ़ाई जाए, तकनीक का बेहतर उपयोग हो और छोटे मामलों का त्वरित निपटारा सुनिश्चित किया जाए। साथ ही सरकारी विभागों को भी अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचना होगा।
दिल्ली के इस बस कंडक्टर का 5 पैसे का मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारे देश में न्याय समय पर मिल पाता है या नहीं। न्याय केवल निर्णय देने का नाम नहीं है, बल्कि समय पर सही निर्णय देने का नाम है। अगर न्याय में दशकों लग जाएं, तो वह न्याय नहीं बल्कि एक लंबी प्रतीक्षा बनकर रह जाता है। यही वह सच्चाई है जिसे स्वीकार कर सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है।


