
हुआ सिलेंडर महंगा अब चकराया हर इंसान है
रसोई की भी आग बुझी जल रही बस जान है
पहले चूल्हा हंसता था पकवानों से घर सजता था
अब खाली बर्तन भी बोले वो पिछला ही दिन अच्छा था
चाय की चुस्की भी सोचे अब बनूं या मैं रह जाऊं
चीनी पत्ती दूध के संग अब गैस का हिस्सा बतलाऊं
अब बाहर समोसा ले ना सकते, 10 में मिलते थे जो दो
15-20 में अकड़ के पूछे लेना हो तो ले लो
दुकानदार भी क्या करें सब महंगा है सामान
सिलेंडर मिलने कम हुए पर बढ़ा दिया है दाम
फ्यूल तो हम पर पहले ही कर चुके थे बार
सोच लिया था कम चलेंगे कुछ तो बचेगा यार
अब रोटी भी लगती है जैसे हो कोई ईनाम
थाली में सब्जी दिख जाए लगाता बड़ा मुकाम
खूब खिलाने वाली मां भी कहती है तू कम खा
बच्चा बोले मां मैं अपनी भूख को कैसे लूं बहला
नेताजी मंचों से बोले सब है अपने काबू में
पर जनता की दौलत है निफ्टी महंगाई की झाड़ू में
आम आदमी अब भी रोता, वही पुराना हाल है
महंगाई की चक्की में पिसता हर परिवार है
सोच रहे सब मिलकर यारों क्या खाएं और क्या ही बचाएं
महंगाई के इस दौर में कैसे अपने स्वप्न सजाएं
लेखक: सूर्या पंडित
(लेखक यूथ इंडिया न्यज ग्रुप के डिप्टी एडिटर हैं।)






