अशोक भाटिया वसई
बिहार में राज्यसभा चुनाव के बीच राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने एक ऐसा राजनीतिक बयान दिया है, जिससे विपक्षी राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है। पटना में मीडिया से बातचीत करते हुए तेजस्वी यादव ने घोषणा की कि उनकी पार्टी केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव में वाम दलों के नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय जनता दल केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के साथ मिलकर तीन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। तेजस्वी यादव के इस बयान को कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि केरल में कांग्रेस वाम दलों के खिलाफ मुख्य विपक्षी भूमिका में रहती है। ऐसे में राजद का वाम दलों के साथ चुनाव लड़ना कांग्रेस के साथ राजनीतिक दूरी का संकेत माना जा रहा है।
बताया जाता है कि बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री ने राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन के विधायकों के साथ बैठक के बाद यह घोषणा की है . गौरतलब है कि सोमवार (16 मार्च) को बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए मतदान होना है. ऐसे में राज्य की पांचवीं सीट को लेकर खींचतान देखी जा रही है. इस सीट पर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम और बहुजन समाज पार्टी किंगमेकर की भूमिका में दिखाई दे रही है. दोनों ही दलों का समर्थन एनडीए या महागठबंधन को मिला तो उसी की जीत होगी. ऐसे में ओवैसी और बीएसपी के विधायकों पर सबकी नजर बनी हुई है.
तेजस्वी यादव ने यह भी कहा कि केरल में उनकी पार्टी का पहले से आधार रहा है और वहां पहले भी राजद के विधायक रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसी कारण पार्टी ने एक बार फिर वहां चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। उनका कहना था कि राजद केरल में वाम दलों के नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी और यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेगी कि यह गठबंधन फिर से सत्ता में लौटे। तेजस्वी यादव ने कहा कि उनकी पार्टी केरल में सीमित सीटों पर चुनाव लड़ेगी, लेकिन गठबंधन के साथ मिलकर काम करेगी।
तेजस्वी यादव के इस फैसले का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि केरल में मुख्य मुकाबला वाम दलों के नेतृत्व वाले गठबंधन और कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा के बीच होता है। इस स्थिति में राजद का वाम दलों के साथ चुनाव लड़ना सीधे तौर पर कांग्रेस के खिलाफ खड़ा होने जैसा माना जा रहा है। बिहार में जहां राज्यसभा चुनाव के दौरान राजद को कांग्रेस के समर्थन की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर केरल में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
केरल की राजनीति लंबे समय से दो प्रमुख गठबंधनों के बीच घूमती रही है। एक ओर वाम दलों के नेतृत्व वाला वाम लोकतांत्रिक मोर्चा है, जबकि दूसरी ओर कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा है। इन दोनों गठबंधनों के बीच राज्य की सत्ता के लिए लगातार मुकाबला होता रहा है। केरल में लंबे समय तक यह परंपरा रही कि हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन होता था और जनता एक बार वाम दलों को तो अगली बार कांग्रेस गठबंधन को सत्ता में लाती थी। इन सब के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिहार और केरल की राजनीति में गठबंधनों का समीकरण बहुत अलग है। बिहार में RJD की अगुवाई वाले महागठबंधन में कांग्रेस और वाम दल छोटे सहयोगी की भूमिका में हैं। वहीं केरल में कांग्रेस और CPI(M) के नेतृत्व वाले वाम दल एक-दूसरे के कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं।
यही कारण है कि जहां बिहार में कांग्रेस और वाम दल एक साथ चुनाव लड़ते हैं, वहीं केरल में दोनों अलग-अलग मोर्चों पर आमने-सामने खड़े होते हैं। ऐसे में RJD का LDF के साथ जाना राजनीतिक रूप से एक दिलचस्प समीकरण बना रहा है। दरअसल, पांच राज्यों की विधानसभा चुनाव तिथियों की घोषणा ने वामपंथी दलों के लिए राजनीतिक रणभूमि तैयार कर दी है। केरल में अपने एकमात्र मजबूत गढ़ को बचाए रखने और पश्चिम बंगाल में खोई राजनीतिक पकड़ को वापस हासिल करने की चुनौती उनके सामने है, जिससे ये चुनाव उनके लिए न केवल सत्ता की रक्षा बल्कि राजनीतिक पुनरुत्थान की कसौटी भी साबित होंगे। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव एमए बेबी ने कहा कि वामपंथी दल संगठनात्मक और राजनीतिक रूप से चुनावों के लिए पूरी तरह तैयार हैं, खासकर केरल में जहां वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की तैयारी कर रहा है।
केरल में 9 अप्रैल को विधानसभा चुनाव होने हैं और इस बार भी राजनीतिक मुकाबला तीन मुख्य मोर्चों के बीच रहने की संभावना है। सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ), जिसे सीपीआई (एम) नेतृत्व दे रही है, विपक्षी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ), जिसका नेतृत्व कांग्रेस कर रही है, और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए), जिसकी अगुवाई भाजपा कर रही है। केरल में कुल 140 विधानसभा सीटें हैं। 2021 के चुनाव में एलडीएफ ने 99 सीटें जीतीं, कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ को 41 सीटें मिलीं और भाजपा कोई सीट नहीं जीत पाई। 2016 में पार्टी ने पहली बार एक सीट जीती थी।
सत्तारूढ़ एलडीएफ की अगुवाई मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन कर रहे हैं। एलडीएफ के लिए यह चुनाव तीसरी लगातार बार सत्ता बनाए रखने की परीक्षा है, जो केरल के चुनावी इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। एलडीएफ ने 2021 में सत्ता में वापसी की थी और राज्य में लंबे समय से बदलती सरकार की परंपरा को तोड़ा था। यूडीएफ का नेतृत्व विपक्ष के नेता वीडी सतीशन कर रहे हैं। यूडीएफ, एलडीएफ सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी का फायदा उठाने की उम्मीद कर रही है। कांग्रेस नेता मानते हैं कि राज्य का राजनीतिक चक्र और स्थानीय चुनावों में दिखा जनता का मूड सरकार बदलने के पक्ष में हो सकता है।
भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के लिए यह चुनाव राज्य में अपनी राजनीतिक पहचान बढ़ाने का मौका है, क्योंकि अब तक उन्होंने वोट शेयर को विधानसभा सीटों में बदलने में सफलता नहीं पाई है। गठबंधन इस बात की उम्मीद कर रहा है कि 2024 लोकसभा चुनाव में त्रिशूर में सुरेश गोपी की जीत से उनकी सक्रियता बढ़ी है और यह उन्हें त्रिकोणीय मुकाबले में मजबूत खिलाड़ी बना सकती है।
हालांकि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में यह परंपरा टूट गई थी। उस चुनाव में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल कर सत्ता में वापसी की थी। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व में वाम दलों का गठबंधन एक बार फिर सत्ता में आया और इस तरह केरल की राजनीति में एक नया अध्याय जुड़ गया।
यदि पिछले विधानसभा चुनाव के परिणामों की बात करें तो राज्य की 140 सीटों में से 97 सीटों पर वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा को 41 सीटों पर सफलता मिली थी। इसके अलावा अन्य दलों को दो सीटों पर जीत मिली थी। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को उस चुनाव में एक भी सीट नहीं मिल सकी थी।
आगामी विधानसभा चुनाव में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा एक बार फिर सत्ता बरकरार रखने की कोशिश में जुटा हुआ है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व में गठबंधन तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है। वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा भी इस बार सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत लगा रहा है।
केरल में भारतीय जनता पार्टी भी अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रही है। पार्टी राज्य में पहली बार उल्लेखनीय सफलता हासिल करने की उम्मीद लगाए हुए है। हालांकि अभी तक पार्टी को केरल की विधानसभा में बड़ी सफलता नहीं मिली है, लेकिन पार्टी लगातार अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
तेजस्वी यादव के इस ऐलान के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केरल में राजद का वाम दलों के साथ जाना राष्ट्रीय स्तर की विपक्षी राजनीति में नए सवाल खड़े कर सकता है। एक ओर जहां विपक्षी दल राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं।
केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सभी दल अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। आगामी चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वाम लोकतांत्रिक मोर्चा अपनी सत्ता बरकरार रख पाता है या फिर राज्य में एक बार फिर सत्ता परिवर्तन की परंपरा लौट आती है। फिलहाल तेजस्वी यादव के इस बयान ने केरल चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभिन्न गठबंधन किस प्रकार चुनावी मैदान में उतरते हैं और मतदाताओं का समर्थन किसे मिलता है।
अशोक भाटिया,
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार ,लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
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