भारतीय जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के लिए कोई नया समझौता नहीं : जयशंकर
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में पिछले 17 दिनों से जारी संघर्ष का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार पर साफ दिखाई देने लगा है। इस संघर्ष के चलते दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। इसी बीच भारत ने कूटनीतिक सक्रियता दिखाते हुए ईरान के साथ सीधे संवाद का रास्ता अपनाया है, जिससे भारतीय ध्वज वाले जहाजों के सुरक्षित आवागमन को सुनिश्चित किया जा रहा है।
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक साक्षात्कार में बताया कि भारत लगातार ईरानी अधिकारियों के साथ सीधे और निर्णायक स्तर पर बातचीत कर रहा है। इस संवाद का सकारात्मक परिणाम सामने आया है और भारतीय झंडा लगे जहाजों को हॉर्मुज जलमार्ग से सुरक्षित गुजरने की अनुमति दी जा रही है। उन्होंने कहा कि अभी कई और भारतीय ध्वज वाले जहाज इस जलमार्ग से गुजरने वाले हैं, जिनके लिए भी इसी प्रकार समन्वय किया जा रहा है।
फाइनेंशियल टाइम्स को दिए अपने इंटरव्यू में जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत और ईरान के बीच इस मुद्दे पर कोई नया औपचारिक समझौता नहीं हुआ है। प्रत्येक भारतीय जहाज को अलग-अलग अनुमति दी जा रही है और यह प्रक्रिया दोनों देशों के बीच पुराने सहयोग और विश्वास के आधार पर आगे बढ़ रही है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के बदले ईरान को भारत की ओर से कोई विशेष लाभ या रियायत नहीं दी गई है। यह किसी प्रकार का लेन-देन नहीं बल्कि आपसी समझ और संवाद का परिणाम है।
दरअसल पिछले सप्ताह ईरान ने दो भारतीय झंडाधारी एलपीजी जहाजों को हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी थी। यह अनुमति उस समय मिली जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेसीयान के बीच टेलीफोन पर बातचीत हुई थी। अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने के बाद दोनों नेताओं के बीच यह पहला सीधा संवाद था। इसके अलावा विदेश मंत्री एस. जयशंकर और उनके ईरानी समकक्ष सैयद अब्बास अराघची के बीच भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी।
हालांकि ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य को केवल अमेरिकी और इस्राइली जहाजों तथा उनके सहयोगियों के लिए बंद किया गया है। वैश्विक स्तर पर यह समुद्री मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्व का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण इस मार्ग के संचालन में बाधा आने लगी है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर भी पड़ा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर करीब 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं।
इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सहयोगी देशों से हॉर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा के लिए युद्धपोत भेजने का आह्वान किया है, लेकिन कई देशों ने इस प्रस्ताव से दूरी बना ली है। जापान, ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों ने इस क्षेत्र में सैन्य जहाज भेजने से इनकार कर दिया है।
ऐसे संवेदनशील हालात में भारत ने सैन्य हस्तक्षेप के बजाय कूटनीतिक और संवाद आधारित रणनीति को प्राथमिकता दी है। विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि भारत ने सीधे बातचीत के जरिए अपने जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का रास्ता चुना है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भारत अपनी रणनीति यूरोपीय देशों के साथ साझा करने को तैयार है, हालांकि हर देश की ईरान के साथ अपनी अलग परिस्थितियां और संबंध हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर बड़ा प्रभाव डाल सकती है। ऐसे में भारत की कूटनीतिक पहल फिलहाल भारतीय समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए राहत भरी खबर मानी जा रही है।


