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Thursday, March 5, 2026

“सनातन की रक्षा के लिए सवर्ण समाज को होना होगा संगठित” – महंत ईश्वरदास

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– दुर्वासा आश्रम से बाबा का बड़ा आह्वान, बोले – सनातन संस्कृति की जड़ों को मजबूत करने के लिए सवर्ण समाज में जागरूकता जरूरी

फर्रुखाबाद। पांचाल घाट स्थित प्राचीन दुर्वासा आश्रम के महंत ईश्वरदास ने सनातन धर्म की रक्षा और सामाजिक संगठन को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सवर्ण समाज को अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है। महंत ईश्वरदास का कहना है कि जब तक सवर्ण समाज संगठित होकर अपने धर्म और परंपराओं की रक्षा के लिए आगे नहीं आएगा, तब तक सनातन संस्कृति को मजबूत आधार नहीं मिल सकेगा।

महंत ईश्वरदास ने कहा कि सनातन धर्म केवल एक आस्था नहीं बल्कि जीवन जीने की एक पूर्ण व्यवस्था है, जिसमें मानव जीवन के नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्यों का समावेश है। उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों से सनातन धर्म ने भारत की संस्कृति, सभ्यता और सामाजिक व्यवस्था को दिशा दी है। यही कारण है कि आज भी दुनिया के अनेक लोग सनातन दर्शन और भारतीय संस्कृति से प्रभावित हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर में तेजी से बदलते सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश के कारण लोगों में अपनी परंपराओं और धार्मिक मूल्यों के प्रति जागरूकता कम होती जा रही है। ऐसे समय में संत समाज की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वह समाज को सही दिशा दिखाए और लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करे।

महंत ईश्वरदास ने विशेष रूप से सवर्ण समाज से आह्वान करते हुए कहा कि उन्हें आपसी मतभेदों को भुलाकर एक मंच पर आने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जब समाज संगठित और जागरूक रहेगा, तभी वह अपनी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा करने में सक्षम होगा। उन्होंने यह भी कहा कि संगठन की शक्ति से ही समाज मजबूत बनता है और समाज मजबूत होगा तो धर्म और संस्कृति भी सुरक्षित रहेंगे।

उन्होंने कहा कि युवाओं को सनातन धर्म की वास्तविकता और उसके मूल सिद्धांतों के बारे में जानकारी देना समय की बड़ी आवश्यकता है। आज की पीढ़ी आधुनिकता के प्रभाव में तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन यदि उसे अपनी संस्कृति और परंपराओं की सही जानकारी दी जाए तो वह समाज और राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

महंत ईश्वरदास ने कहा कि संत समाज का उद्देश्य हमेशा से समाज को जोड़ना और सही मार्ग दिखाना रहा है। उन्होंने कहा कि पांचाल घाट का दुर्वासा आश्रम वर्षों से धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है, जहां समय-समय पर धर्म और संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और समाज को जागरूक करने का प्रयास किया जाता है।

उन्होंने अंत में कहा कि सनातन धर्म की रक्षा केवल किसी एक वर्ग या व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं बल्कि पूरे सवर्ण समाज की जिम्मेदारी है। यदि समाज एकजुट होकर अपनी संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक मूल्यों के संरक्षण के लिए कार्य करेगा तो आने वाली पीढ़ियां भी इस महान विरासत को गर्व के साथ आगे बढ़ा सकेंगी।

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