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Saturday, February 28, 2026

देश में जातिवाद और धर्म के नाम पर पनप रही कट्टरता, सामाजिक ताने-बाने के लिए गंभीर चुनौती

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राजीव भल्ला
भारत की पहचान उसकी विविधता, सह-अस्तित्व और सदियों पुरानी साझा संस्कृति से बनती है। यहां अनेक धर्म, भाषाएं और सामाजिक समूह एक साथ रहते आए हैं। लेकिन जब जाति और धर्म के नाम पर कट्टरता, घृणा और हिंसा को बढ़ावा मिलता है, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह जाता—यह राष्ट्र की आत्मा के लिए चुनौती बन जाता है।
सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि आतंकवाद किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। वह चाहे किसी धर्म, जाति या विचारधारा की आड़ में हो—हिंसा और भय फैलाने की मानसिकता लोकतांत्रिक समाज के लिए घातक है। जब पहचान की राजनीति नफरत का रूप ले लेती है, तब कुछ तत्व उसे चरमपंथ की दिशा में मोड़ देते हैं।
आज डिजिटल युग में नफरत का प्रसार पहले से कहीं तेज हो गया है। सोशल मीडिया पर भड़काऊ संदेश, अफवाहें और उकसावे वाली भाषा युवाओं के मन में विभाजन की भावना भर सकती है। बेरोजगारी, असुरक्षा और सामाजिक असंतोष जैसे कारक भी कट्टर विचारधाराओं के लिए जमीन तैयार कर देते हैं।
धर्म, जो मूल रूप से करुणा, सेवा और नैतिकता का संदेश देता है, जब राजनीतिक स्वार्थों के साथ जुड़ता है तो उसका स्वरूप बदल सकता है। इसी प्रकार जाति, जो कभी सामाजिक संरचना का हिस्सा थी, यदि श्रेष्ठता और हीनता के दावे का आधार बन जाए, तो समाज में गहरी दरारें पैदा होती हैं।
कट्टरता का सबसे बड़ा नुकसान युवाओं को होता है। युवा ऊर्जा, जो नवाचार और राष्ट्र निर्माण में लगनी चाहिए, वह आपसी टकराव में खर्च होने लगती है। विश्वविद्यालयों, सड़कों और डिजिटल मंचों पर यदि संवाद के बजाय आरोप-प्रत्यारोप हावी हो जाएं, तो भविष्य की दिशा भटक सकती है।
इतिहास बताता है कि जब भी समाज पहचान के आधार पर बंटा है, विकास की गति धीमी हुई है। आर्थिक निवेश, सामाजिक विश्वास और वैश्विक छवि—तीनों प्रभावित होते हैं। इसलिए यह केवल नैतिक या सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी है।
समाधान बहुआयामी है।
पहला, शिक्षा में संवैधानिक मूल्यों—समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व—पर अधिक जोर देना होगा।
दूसरा, कानून-व्यवस्था को सख्ती और निष्पक्षता से लागू करना होगा, ताकि हिंसा और उकसावे को कोई संरक्षण न मिले।
तीसरा, धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व को मिलकर शांति और समरसता का संदेश देना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण भूमिका युवाओं की है। उन्हें यह समझना होगा कि पहचान पर गर्व स्वाभाविक है, लेकिन किसी अन्य की अवमानना या हिंसा का औचित्य नहीं बन सकता। बहस हो सकती है, असहमति हो सकती है, लेकिन वह लोकतांत्रिक दायरे में रहनी चाहिए।
भारत की ताकत उसकी बहुलता में है। यदि हम विविधता को संघर्ष का कारण बना देंगे, तो वह शक्ति कमजोर पड़ जाएगी। पर यदि हम विविधता को सहयोग और संवाद का आधार बनाएंगे, तो यही शक्ति राष्ट्र को आगे ले जाएगी।
आज जरूरत है कि जाति और धर्म के नाम पर फैलती कट्टरता को पहचानकर समय रहते रोका जाए। यह कार्य केवल सरकार या किसी एक संस्था का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है।
राष्ट्र निर्माण नफरत से नहीं, विश्वास से होता है। और विश्वास तभी बनेगा जब हम पहचान की सीमाओं से ऊपर उठकर इंसानियत को प्राथमिकता देंगे।

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