शुभम
भारत की मिट्टी में पले-बढ़े अखाड़ों की परंपरा केवल कसरत की विधि नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवनशैली है। आज जब युवा वर्ग एसी जिम, महंगे उपकरण और सप्लीमेंट्स की ओर आकर्षित हो रहा है, तब भी देशी वर्कआउट अपनी प्रभावशीलता, सादगी और परिणामों के कारण प्रासंगिक बना हुआ है। दंड-बैठक, कुश्ती, गदा चलाना, रस्सी चढ़ना और दौड़ जैसे अभ्यास शरीर को प्राकृतिक तरीके से मजबूत बनाते हैं।
देशी वर्कआउट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूरे शरीर को एक साथ सक्रिय करता है। दंड लगाने से छाती, कंधे, बाजू, पीठ और कोर मसल्स एक साथ काम करते हैं। बैठक जांघों और घुटनों को मजबूत बनाती है। मिट्टी में कुश्ती शरीर को ताकत के साथ संतुलन और फुर्ती भी देती है। इस तरह यह पद्धति केवल बाहरी मांसपेशियों को नहीं, बल्कि अंदरूनी शक्ति और सहनशक्ति को भी विकसित करती है।
आर्थिक दृष्टि से भी देशी वर्कआउट बेहद उपयोगी है। इसमें महंगे जिम, मशीन या उपकरण की आवश्यकता नहीं होती। एक खुला मैदान या साधारण अखाड़ा ही पर्याप्त है। ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं के लिए यह कम खर्च में बेहतरीन फिटनेस पाने का सशक्त माध्यम है।
मानसिक मजबूती देशी व्यायाम की एक महत्वपूर्ण देन है। अखाड़ों में अनुशासन, समय का पालन, संयमित आहार और गुरु-शिष्य परंपरा का पालन किया जाता है। इससे आत्मविश्वास, धैर्य और आत्मनियंत्रण विकसित होता है। नियमित शारीरिक श्रम तनाव को कम करता है और मन को स्थिर बनाता है।
स्वास्थ्य की दृष्टि से भी देशी वर्कआउट अत्यंत लाभकारी है। इससे हृदय और फेफड़े मजबूत होते हैं, रक्त संचार बेहतर होता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। प्राकृतिक व्यायाम हार्मोन संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है, जिससे ऊर्जा स्तर ऊँचा रहता है और शरीर चुस्त-दुरुस्त बना रहता है।
देशी वर्कआउट भारतीय संस्कृति से जुड़ाव का भी प्रतीक है। यह केवल शरीर निर्माण नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की प्रक्रिया है। मिट्टी में गिरकर उठना, मेहनत से पसीना बहाना और निरंतर अभ्यास करना युवाओं को जीवन के संघर्षों के लिए तैयार करता है।
अंततः कहा जा सकता है कि देशी वर्कआउट केवल ताकत बढ़ाने की विधि नहीं, बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व विकास का माध्यम है। यदि युवा नियमित रूप से पारंपरिक व्यायाम को अपनाएं, तो वे बिना महंगे साधनों के भी स्वस्थ, सशक्त और आत्मविश्वासी जीवन जी सकते हैं। मिट्टी से जुड़ी यह परंपरा आज भी उतनी ही प्रभावी है जितनी सदियों पहले थी।






