डॉ विजय गर्ग
मनुष्य के बौद्धिक विकास में पढ़ने की आदत अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन केवल पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है; पढ़ने का परिवेश भी उतना ही आवश्यक है। शांत, प्रेरणादायक और संसाधनों से समृद्ध वातावरण व्यक्ति में जिज्ञासा, एकाग्रता और गहन चिंतन की क्षमता विकसित करता है।
पढ़ने का परिवेश क्या है?
पढ़ने का परिवेश उस वातावरण को कहा जाता है जहाँ व्यक्ति सहजता से पढ़ सके, समझ सके और सीखी हुई बातों पर विचार कर सके। इसमें भौतिक वातावरण, मानसिक स्थिति और सामाजिक सहयोग — तीनों का योगदान होता है।
अच्छा पढ़ने का परिवेश क्यों जरूरी है?
1. एकाग्रता बढ़ाता है – शांत वातावरण ध्यान भटकने से रोकता है।
2. समझने की क्षमता विकसित करता है – व्यवस्थित स्थान और पर्याप्त प्रकाश पढ़ने को आसान बनाते हैं।
3. जिज्ञासा को प्रोत्साहित करता है – पुस्तकों से घिरा वातावरण सीखने की इच्छा जगाता है।
4. आत्म-अनुशासन विकसित करता है – नियमित अध्ययन की आदत बनती है।
आदर्श पढ़ने के परिवेश की विशेषताएँ
1. शांत और स्वच्छ स्थान
शोर-शराबे से दूर, साफ और व्यवस्थित जगह पढ़ने के लिए उपयुक्त होती है। स्वच्छता मन को स्थिरता प्रदान करती है।
2. पर्याप्त प्रकाश और हवा
प्राकृतिक प्रकाश सबसे उत्तम होता है। अच्छी रोशनी आँखों पर तनाव कम करती है और ताजी हवा मस्तिष्क को सक्रिय रखती है।
3. उचित बैठने की व्यवस्था
आरामदायक कुर्सी और सही ऊँचाई की मेज शरीर को थकान से बचाती है, जिससे लंबे समय तक पढ़ना संभव होता है।
4. पुस्तकों की उपलब्धता
घर, विद्यालय और पुस्तकालयों में विभिन्न विषयों की पुस्तकें उपलब्ध होने से बच्चों और युवाओं की रुचि बढ़ती है।
5. डिजिटल विकर्षणों से दूरी
मोबाइल फोन और अनावश्यक स्क्रीन समय पढ़ाई में बाधा डालते हैं। पढ़ते समय इनसे दूरी बनाए रखना आवश्यक है।
परिवार और विद्यालय की भूमिका
माता-पिता बच्चों को कहानी पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करें।
घर में “पढ़ने का समय” निर्धारित किया जा सकता है।
विद्यालयों में पुस्तकालय संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए।
शिक्षक विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पढ़ने का वातावरण
ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों की कमी हो सकती है, परंतु सामुदायिक पुस्तकालय, विद्यालय पुस्तकालय और मोबाइल पुस्तकालय इस कमी को दूर कर सकते हैं। शहरी क्षेत्रों में संसाधन अधिक होते हैं, लेकिन डिजिटल व्याकुलता एक बड़ी चुनौती बन जाती है।
डिजिटल युग में पढ़ने का परिवेश
ई-पुस्तकें और ऑनलाइन संसाधन ज्ञान का विस्तार कर रहे हैं, परंतु संतुलन आवश्यक है। स्क्रीन और मुद्रित पुस्तकों दोनों का संतुलित उपयोग सर्वोत्तम परिणाम देता है।
निष्कर्ष
पढ़ने का अनुकूल परिवेश व्यक्ति के बौद्धिक और नैतिक विकास की नींव रखता है। यह केवल परीक्षा में सफलता का साधन नहीं, बल्कि जीवन भर सीखते रहने की आदत विकसित करने का माध्यम है। यदि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा दें, तो एक जागरूक, संवेदनशील और ज्ञानसम्पन्न समाज का निर्माण संभव है।
पढ़ने का सही वातावरण केवल किताबों से नहीं बनता — यह सोच, अनुशासन और प्रेरणा से निर्मित होता है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब






