लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपने उन बागी विधायकों की वापसी को लेकर स्पष्ट रणनीति तैयार कर ली है, जिन्होंने पिछले राज्यसभा चुनाव में पार्टी लाइन से हटकर भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में मतदान किया था। अब पार्टी नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि जिस रास्ते से वे बाहर गए थे, उसी रास्ते से होकर उन्हें वापसी का अवसर मिलेगा। यानी आगामी राज्यसभा चुनाव में सपा प्रत्याशियों के समर्थन में मतदान करना ही उनकी ‘घर वापसी’ की शर्त होगी।
दरअसल फरवरी 2024 में उत्तर प्रदेश में हुए राज्यसभा चुनाव में बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिला था। उस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के आठ और समाजवादी पार्टी के दो प्रत्याशी विजयी हुए थे। सपा के सात विधायकों—मनोज पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, राकेश पांडेय, पूजा पाल, विनोद चतुर्वेदी और आशुतोष मौर्य—ने पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के बजाय भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी। इसका सीधा लाभ भाजपा को मिला और उसके आठवें प्रत्याशी संजय सेठ को जीत हासिल हुई, जबकि सपा के तीसरे प्रत्याशी और पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन को हार का सामना करना पड़ा।
इस घटनाक्रम के बाद सपा नेतृत्व ने सख्त रुख अपनाते हुए मनोज पांडेय, अभय सिंह, राकेश प्रताप सिंह और पूजा पाल को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। उस समय पार्टी ने इसे अनुशासनहीनता और विचारधारा से विचलन करार दिया था। हालांकि अब बदले राजनीतिक हालात में सपा ने संकेत दिए हैं कि वापसी के दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं हैं, लेकिन शर्तों के साथ।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने स्पष्ट कर दिया है कि जो विधायक पार्टी में दोबारा शामिल होना चाहते हैं, उन्हें सार्वजनिक बयानबाज़ी के बजाय व्यवहार से अपनी निष्ठा सिद्ध करनी होगी। बताया जा रहा है कि सत्ताधारी दल के करीब जाने वाले कुछ बागी विधायक अपेक्षित राजनीतिक महत्व न मिलने से असहज हैं और उन्होंने सपा नेतृत्व से संपर्क साधा है। पार्टी का रुख उनके प्रति पूरी तरह नकारात्मक नहीं है, लेकिन उन्हें ‘लॉयल्टी टेस्ट’ से गुजरना होगा।
सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश कोटे की राज्यसभा की 10 सीटें 25 नवंबर को रिक्त हो रही हैं, जिनके लिए उससे पहले चुनाव कराए जाएंगे। सपा ने साफ संकेत दिया है कि यदि वापसी के इच्छुक विधायक इस चुनाव में पार्टी प्रत्याशियों के पक्ष में मतदान करते हैं, तो उन्हें बिना किसी औपचारिक माफीनामे के पुनः पार्टी में शामिल किया जा सकता है। यानी लिखित क्षमायाचना की शर्त नहीं रखी गई है, बल्कि राजनीतिक आचरण को ही कसौटी बनाया गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा का यह कदम दोहरा संदेश देता है—एक ओर पार्टी अनुशासन और विचारधारा के प्रति कठोरता दिखाना चाहती है, वहीं दूसरी ओर भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए दरवाज़े भी खुले रखना चाहती है। आगामी राज्यसभा चुनाव इस दृष्टि से न केवल संख्या बल का परीक्षण होंगे, बल्कि सपा के भीतर ‘निष्ठा बनाम अवसरवाद’ की बहस का भी निर्णायक पड़ाव साबित हो सकते हैं।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बागी विधायक राजनीतिक समीकरणों को किस दिशा में मोड़ते हैं—क्या वे सपा की शर्त स्वीकार कर वापसी का रास्ता चुनेंगे या फिर मौजूदा पाले में ही बने रहेंगे। आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस मुद्दे पर और तेज़ी आने के संकेत है।






