यूथ इंडिया न्यूज़ नेटवर्क
वॉशिंगटन। जब विश्व की महाशक्ति अमेरिका में कार्यपालिका की ताकत पर सवाल खड़ा हुआ, तब एक भारतीय मूल के विधि-विशारद ने अदालत में खड़े होकर संविधान की सर्वोच्चता का पक्ष रखा। नाम है — नील कात्याल ।
टैरिफ विवाद अब भले ही पुराना हो चुका हो, लेकिन उस कानूनी संघर्ष में नील कत्याल की भूमिका आज भी लोकतांत्रिक मूल्यों की मिसाल मानी जाती है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आर्थिक नीति को सीधे अदालत में चुनौती देकर यह संदेश दिया कि कानून से ऊपर कोई नहीं।
मामला जब सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स पहुंचा, तब कत्याल ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि व्यापक व्यापारिक निर्णयों पर अंतिम अधिकार कांग्रेस का है। उन्होंने न्यायालय के समक्ष तर्क रखा कि आपात शक्तियों का प्रयोग सीमित और जिम्मेदार दायरे में होना चाहिए।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि उनकी दलीलों ने बहस की दिशा बदल दी और सत्ता की निरंकुशता पर अंकुश लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
क्यों खास हैं नील कत्याल?
अमेरिका के शीर्ष संवैधानिक वकीलों में शुमार हैं, साथ ही वह पूर्व कार्यवाहक सॉलिसिटर जनरल के रूप मे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में अनेक ऐतिहासिक मामलों की पैरवी कर चुके हैं।
भारतीय मूल के होते हुए वैश्विक मंच पर कानून की मजबूती का प्रतीक नील की पहचान केवल एक वकील की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के रक्षक के रूप में स्थापित हुई।
नील कत्याल की कानूनी दृढ़ता ने यह साबित किया कि प्रतिभा और सिद्धांतों की कोई सीमा नहीं होती। भारतीय मूल का एक अधिवक्ता जब विश्व की सबसे बड़ी अदालत में संविधान की रक्षा के लिए खड़ा होता है, तो वह केवल एक केस नहीं लड़ता— वह मूल्यों की लड़ाई लड़ता है।
यह प्रकरण याद दिलाता है कि लोकतंत्र में अदालतें केवल विवाद सुलझाने की जगह नहीं, बल्कि अधिकारों और संतुलन की अंतिम संरक्षक हैं। और जब कोई वकील निर्भीक होकर सत्ता से सवाल करता है, तो वह इतिहास में दर्ज हो जाता है।नील कत्याल एक नाम, जो कानून की मर्यादा और साहस की पहचान बन चुका है।






