– नई दिल्ली स्थित चंद्रशेखर भवन मे यूथ इंडिया न्यूज़ ग्रुप के एडिटर इन चीफ शरद कटियार की सीधी बात
नई दिल्ली: आईटीओ स्थित चंद्रशेखर भवन की दीवारों पर टंगी तस्वीरें एक दौर की साक्षी हैं—वह दौर जब राजनीति विचार, साहस और आत्मसम्मान की धुरी पर घूमती थी। यूथ इंडिया के चीफ एडिटर (Chief Editor of Youth India) की मुलाकात जब देश के वरिष्ठ चिंतक और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्र शेखर (Former PM late Chandrashekhar) के राजनीतिक सलाहकार रहे एच.एन. शर्मा से हुई, तो बातचीत केवल स्मृतियों का पुनर्स्मरण नहीं, बल्कि इतिहास के जीवंत पन्नों से साक्षात्कार बन गई।
एच.एन. शर्मा—जिन्हें देश का एक गंभीर राजनीतिक विश्लेषक और मार्गदर्शक व्यक्तित्व माना जाता है—ने भावुक स्वर में कहा, “मैं 1964 से उनके साथ रहा। उनका संघर्ष देखा,उनकी जेल यात्रा देखी, उनकी सत्ता भी देखी—लेकिन सबसे अधिक सादगी देखी।”“वह पद के लिए नहीं, विचार के लिए थे”श्री शर्मा बताते हैं कि चंद्रशेखर को ‘युवा तुर्क’ केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व का परिचय था।“कांग्रेस के भीतर भी वे बेबाक थे। सत्ता से सवाल पूछते थे। समझौता उनके स्वभाव में नहीं था। राजनीति उनके लिए सेवा थी, प्रतिष्ठा नहीं।”
उन्होंने कहा कि चंद्रशेखर जी का स्पष्ट मानना था कि सत्ता साधन है, लक्ष्य नहीं।“किसी मुख्यमंत्री या राज्यपाल के दफ्तर नहीं गए” शर्मा ने एक ऐतिहासिक प्रसंग साझा करते हुए कहा—“उन्होंने कभी किसी मुख्यमंत्री या राज्यपाल के कार्यालय में औपचारिक मुलाकात के लिए कदम नहीं रखा। वे केवल नामांकन दाखिल करने जाते थे। अगर किसी दफ्तर में सीधे गए तो वह प्रधानमंत्री कार्यालय था—और वह भी तब, जब वे स्वयं प्रधानमंत्री बने।” यह प्रसंग उनके आत्मसम्मान और राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रतीक है। 1975 की इमरजेंसी को याद करते हुए शर्मा की आंखें नम हो गईं।
“लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा था। उन्हें गिरफ्तार किया गया। एक बार थाने भी गए। लेकिन उन्होंने कभी झुकना नहीं सीखा। उनके लिए लोकतंत्र कोई नारा नहीं, जीवन था।” उन्होंने कहा कि जेल की दीवारें भी उनके विचारों को कैद नहीं कर सकीं।
गंगापुर से दिल्ली तक की यात्रा
उत्तर प्रदेश के बलिआ जिले के गंगापुर गांव से निकले श्री शर्मा ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। आज भी उनसे आंध्र, कन्याकुमारी,तमिलनाडु जैसे प्रांतों से लोग मिलने आते हैं शनिवार को उनकी मुलाकात ब्राजील के देश आए प्रधानमंत्री से हुईं। “प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे गांव को नहीं भूले। उनकी डायरी में किसान, गरीब और लोकतंत्र का दर्द झलकता है,” शर्मा ने कहा।
प्रधानमंत्री रहते हुए भी सादगी
शर्मा ने विशेष रूप से उल्लेख किया,“प्रधानमंत्री रहते हुए भी उन्होंने सरकारी आवास में स्थायी रूप से रहना पसंद नहीं किया। वे सादगी में विश्वास करते थे। उनका जीवन संदेश था कि पद से बड़ा सिद्धांत होता है।”
आज भी उनकी सलाह का लोहा मानते हैं नेता
एच.एन. शर्मा स्वयं आज भी देश के जाने-माने व्यक्तित्व हैं। राजनीतिक और वैचारिक मुद्दों पर उनकी स्पष्ट सोच का सम्मान विभिन्न दलों के नेता करते रहे हैं। श्री शर्मा ने विनम्रता से कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ , देश के बड़े नेता वैचारिक संवाद को महत्व देते हैं। लोकतंत्र में संवाद ही ताकत है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि चंद्रशेखर जी की परंपरा संवाद और वैचारिक स्पष्टता की रही है—और वही लोकतंत्र को जीवंत रखती है। बातचीत के अंत में शर्मा कुछ क्षणों के लिए मौन रहे। फिर धीमे स्वर में बोले—“आज राजनीति बदल गई है, लेकिन चंद्रशेखर जी जैसे लोग इतिहास नहीं, प्रेरणा होते हैं। वह पद के पीछे नहीं, सिद्धांत के पीछे चलते थे।”
चंद्रशेखर भवन की दीवारों पर टंगी तस्वीरें जैसे इस कथन की पुष्टि करती हैं—एक ऐसा प्रधानमंत्री, जिसने सत्ता से अधिक विचार को महत्व दिया। यह साक्षात्कार केवल एक स्मरण नहीं, बल्कि उस युग का दस्तावेज है जब राजनीति आत्मसम्मान और वैचारिक निष्ठा का पर्याय थी।


