
सूर्या अग्निहोत्री
भारत की सभ्यता और अर्थव्यवस्था का मूल आधार प्रकृति रही है। खेत, जंगल, जलस्रोत, पशुधन और मिट्टी—इन सबने सदियों तक न केवल जीवन दिया, बल्कि रोजगार का स्थायी साधन भी प्रदान किया। आधुनिक दौर में जब बेरोजगारी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है, तब आवश्यकता है कि हम प्रकृति आधारित रोजगार के पारंपरिक और आधुनिक दोनों मॉडलों को समझें और उन्हें संगठित रूप दें।
प्रकृति से जुड़ा रोजगार केवल खेती तक सीमित नहीं है। कृषि के साथ-साथ बागवानी, औषधीय पौधों की खेती, मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन, मत्स्य पालन, डेयरी, मुर्गी पालन और जैविक खाद निर्माण जैसे अनेक क्षेत्र हैं, जो कम पूंजी में शुरू किए जा सकते हैं और निरंतर आय का स्रोत बन सकते हैं। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में यह मॉडल युवाओं के लिए स्वरोजगार का मजबूत विकल्प प्रस्तुत करता है।
आज बाजार में जैविक और प्राकृतिक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। रासायनिक मुक्त अनाज, सब्जियां, मसाले और फल उपभोक्ताओं की प्राथमिकता बन रहे हैं। यदि किसान और युवा संगठित तरीके से जैविक खेती करें, ब्रांडिंग और पैकेजिंग के साथ सीधे बाजार तक पहुंचें, तो उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। प्रकृति आधारित उत्पादों को मूल्य संवर्धन के साथ बेचा जाए—जैसे आंवला से मुरब्बा, आम से अचार, हल्दी और अदरक से प्रोसेस्ड पाउडर—तो रोजगार की श्रृंखला और लंबी हो जाती है।
वन और पर्यावरण से जुड़े क्षेत्र भी रोजगार के बड़े स्रोत हैं। वनोपज संग्रह, हर्बल उत्पाद निर्माण, बांस और लकड़ी आधारित हस्तशिल्प, इको-टूरिज्म, प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण केंद्र—ये सभी गतिविधियाँ स्थानीय युवाओं को आय का अवसर देती हैं। यदि इन क्षेत्रों को सरकारी योजनाओं और तकनीकी प्रशिक्षण से जोड़ा जाए, तो हजारों परिवार आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन भी रोजगार सृजन का माध्यम बन सकते हैं। तालाबों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, वृक्षारोपण अभियान, नर्सरी विकास—इन सबमें स्थानीय श्रमिकों और युवाओं की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आय का स्रोत भी तैयार होता है।
प्रकृति आधारित रोजगार का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें बड़े उद्योगों की तरह भारी निवेश की आवश्यकता नहीं होती। स्थानीय संसाधन ही इसकी पूंजी होते हैं। यदि प्रशिक्षण, विपणन और वित्तीय सहायता का समुचित समन्वय हो जाए, तो यह मॉडल गांवों में आर्थिक क्रांति ला सकता है।
आज समय की मांग है कि रोजगार को केवल शहरी उद्योगों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि प्रकृति से जुड़े पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के संयोजन से नए अवसर पैदा किए जाएं। जब युवा खेत, जंगल और जल से जुड़ी संभावनाओं को पहचानेंगे, तब बेरोजगारी की समस्या का समाधान स्वाभाविक रूप से निकलने लगेगा।
प्रकृति हमें केवल जीवन ही नहीं देती, बल्कि जीवनयापन का आधार भी प्रदान करती है। आवश्यकता है उसे समझने, संजोने और संगठित रूप से अपनाने की। तभी हरियाली सच मायने में समृद्धि का प्रतीक बन सकेगी।
(लेखक यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप के डिप्टी एडिटर हैं।)






