शरद कटियार
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब केवल तकनीकी शब्द नहीं रहा, बल्कि यह शासन, समाज और लोकतंत्र की संरचना को प्रभावित करने वाली निर्णायक शक्ति बन चुका है। नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ‘ए-आई फॉर डेमोक्रेसी’ सत्र में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Lok Sabha Speaker Om Birla) ने जिस दृष्टि को सामने रखा, वह इस परिवर्तन की गंभीरता को रेखांकित करती है।
एआई का मूल स्वभाव डेटा, गति और विश्लेषण की क्षमता पर आधारित है। लोकतंत्र का मूल स्वभाव संवाद, भागीदारी और जवाबदेही पर। जब ये दोनों एक साथ आते हैं, तो शासन की कार्यप्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव संभव हो जाता है। एआई के माध्यम से विधायी कार्यवाहियों को व्यवस्थित करना, उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराना और नागरिकों के लिए सुलभ बनाना लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी बना सकता है।
डिजिटल संसद और डेटा-आधारित विश्लेषण से निर्णय प्रक्रिया अधिक तथ्यात्मक और कम अनुमान-आधारित हो सकती है। इससे न केवल नीतियां प्रभावी बनेंगी, बल्कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही भी बढ़ेगी। एआई नागरिकों की समस्याओं, सुझावों और प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण कर नीति-निर्माताओं को त्वरित फीडबैक दे सकता है। यह लोकतंत्र को अधिक सहभागी और उत्तरदायी बना सकता है।
लेकिन एआई की यही शक्ति लोकतंत्र के लिए खतरा भी बन सकती है। डीपफेक तकनीक, फर्जी वीडियो और कृत्रिम रूप से तैयार की गई भ्रामक सूचनाएं जनमत को प्रभावित कर सकती हैं। यदि तकनीक का उपयोग सत्य के बजाय भ्रम फैलाने के लिए किया गया, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो सकती हैं। इसलिए एआई के उपयोग के साथ सख्त नैतिक मानक, पारदर्शी नियमन और डिजिटल साक्षरता आवश्यक है।
लोकतंत्र में विश्वास सबसे बड़ी पूंजी है। एआई को इस विश्वास को मजबूत करने का साधन बनना चाहिए, न कि उसे चुनौती देने का। एआई शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे क्षेत्रों में असाधारण संभावनाएं रखता है।
शिक्षा में व्यक्तिगत शिक्षण मॉडल
स्वास्थ्य में सटीक निदान और उपचार,कृषि में मौसम और उत्पादन का पूर्वानुमान
ये सभी पहलें देश को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में गति दे सकती हैं।
लेकिन विकास केवल तकनीकी दक्षता से नहीं होता; उसमें मानवीय संवेदनाएं और सामाजिक संतुलन भी आवश्यक है। एआई को मानव मूल्यों के अधीन रखना ही उसकी सफलता की शर्त है।
तकनीक और नैतिकता का संतुलन
एआई का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि उसे किस दृष्टिकोण से अपनाया जाता है। यदि इसे केवल दक्षता बढ़ाने के उपकरण के रूप में देखा गया, तो यह अधूरा होगा। यदि इसे पारदर्शिता, समावेशन और नैतिक शासन के साधन के रूप में अपनाया गया, तो यह लोकतंत्र का सशक्त प्रहरी बन सकता है। भारत के पास अवसर है कि वह एआई को लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ संतुलित कर विश्व के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करे।
एआई लोकतंत्र को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की क्षमता रखता है, लेकिन यह एक परीक्षा भी है—नीति निर्माताओं, तकनीकी विशेषज्ञों और नागरिक समाज के लिए। भविष्य का लोकतंत्र वही होगा जो तकनीक को अपनाएगा, लेकिन अपने मूल्यों को नहीं छोड़ेगा। एआई को मानवता, सत्य और संवैधानिक मर्यादाओं के अधीन रखकर ही लोकतंत्र की मजबूती सुनिश्चित की जा सकती है।


