शरद कटियार
यौन अपराधों से जुड़े कुछ न्यायिक निर्णयों ने समाज में नई बहस छेड़ी; सवाल यह नहीं कि अदालतें स्वतंत्र हैं या नहीं, सवाल यह है कि क्या न्याय की भाषा समाज को भरोसा दे पा रही है?
देश में समय-समय पर ऐसे न्यायिक फैसले सामने आते हैं जो व्यापक सामाजिक चर्चा का विषय बन जाते हैं। विशेषकर महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अदालतों की टिप्पणियाँ और कानूनी व्याख्याएँ आम नागरिकों को सीधे प्रभावित करती हैं। हालिया निर्णयों को लेकर भी समाज के विभिन्न वर्गों में असहजता और चिंता दिखाई दी है।
यह समझना आवश्यक है कि अदालतें कानून की धाराओं के आधार पर निर्णय देती हैं। परंतु यौन अपराध केवल तकनीकी परिभाषाओं तक सीमित विषय नहीं हैं। वे पीड़िता की गरिमा, सामाजिक संदेश और न्याय व्यवस्था पर जनता के भरोसे से जुड़े होते हैं।
भारतीय दंड संहिता तथा नए आपराधिक कानूनों में बलात्कार और उसके प्रयास की परिभाषा स्पष्ट रूप से दी गई है। अदालतें इन्हीं प्रावधानों के अनुसार तथ्यों का परीक्षण करती हैं। लेकिन जब निर्णयों की भाषा आमजन को कठोर या अत्यधिक तकनीकी प्रतीत होती है, तब समाज में यह प्रश्न उठता है कि क्या न्याय की आत्मा पर्याप्त रूप से परिलक्षित हो रही है?
न्याय केवल धारा पढ़कर लागू करना नहीं है यह उस सामाजिक संदर्भ को भी समझना है जिसमें अपराध घटित होता है। यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक भाषा और दृष्टिकोण अत्यंत संवेदनशील होना चाहिए।
लोकतंत्र में न्यायपालिका स्वतंत्र है और उसका सम्मान सर्वोपरि है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि निर्णयों पर कोई विमर्श न हो। संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, बशर्ते वह तथ्यात्मक और मर्यादित हो।
निर्णयों की आलोचनात्मक समीक्षा और व्यक्तिगत आक्षेप में अंतर है। पहला लोकतांत्रिक अधिकार है, दूसरा कानून के दायरे में आ सकता है। इसलिए आवश्यक है कि सार्वजनिक बहस संयमित और तर्कपूर्ण हो।
यौन अपराधों से जुड़े मामलों में समाज की अपेक्षा है कि:
न्यायिक भाषा पीड़िता-केंद्रित हो
फैसले स्पष्ट और संतुलित हों
न्याय की प्रक्रिया से भरोसा पैदा हो
आज महिलाएं और बच्चे पहले से अधिक कानूनी जागरूक हैं। ऐसे में हर निर्णय केवल कानूनी मिसाल नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी बन जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि
जेंडर सेंसिटाइजेशन प्रशिक्षण को और मजबूत किया जाना चाहिए
यौन अपराधों की कानूनी परिभाषाओं को और स्पष्ट बनाया जा सकता है
निर्णयों में विस्तृत तर्क और सामाजिक प्रभाव का उल्लेख जरूरी है।लोकतंत्र में तीन बातें याद रखें,न्यायपालिका की स्वतंत्रता अनिवार्य है,मर्यादित आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है,संवेदनशील मामलों में भाषा और दृष्टिकोण दोनों महत्वपूर्ण हैं
न्याय केवल दिया जाना ही पर्याप्त नहीं; न्याय ऐसा होना चाहिए जिस पर समाज भरोसा कर सके। यौन अपराधों जैसे गंभीर मामलों में तकनीकी व्याख्या और मानवीय संवेदना दोनों का संतुलन आवश्यक है।न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखते हुए, निर्णयों पर तार्किक चर्चा लोकतंत्र को मजबूत करती है।
न्याय की तकनीकी व्याख्या बनाम संवेदनशीलता: आखिर संतुलन कहाँ है?


