नई दिल्ली/ग्रेटर नोएडा। हाल ही में दिल्ली में आयोजित एक एआई समिट में कमर्शियल रोबोट को विश्वविद्यालय की उपलब्धि बताकर प्रस्तुत किए जाने के आरोपों के बाद गलगोटिया यूनिवर्सिटी चर्चा में है। इस बीच लोगों के मन में सवाल उठ रहा है—आखिर इस बड़े शिक्षा समूह के पीछे कौन है?
गलगोटिया यूनिवर्सिटी के प्रमुख और संस्थापक हैं सुनील गलगोटिआ । वे गलगोटिस यूनिवर्सिटी और गलगोटिस एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन्स के चेयरमैन माने जाते हैं।
सुनिल गलगोटिया ने 1990 के दशक में शिक्षा क्षेत्र में कदम रखा और इंजीनियरिंग व मैनेजमेंट कॉलेज से शुरुआत कर धीरे-धीरे एक बड़े शैक्षणिक समूह की स्थापना की। आज ग्रेटर नोएडा स्थित विश्वविद्यालय देश-विदेश के हजारों छात्रों को शिक्षा दे रहा है।
बताया जाता है कि सुनील गलगोटिया ने सीमित संसाधनों के साथ शिक्षा क्षेत्र में शुरुआत की। तकनीकी शिक्षा के बढ़ते बाजार को पहचानते हुए उन्होंने निजी संस्थानों की श्रृंखला खड़ी की।
इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेज
फार्मेसी, लॉ, मीडिया जैसे विविध कोर्स संचालित होते हैं।
समय के साथ गलगोटिया समूह उत्तर भारत के प्रमुख निजी शिक्षा ब्रांड्स में शामिल हो गया।
हाल ही में दिल्ली एआई समिट में एक रोबोट को विश्वविद्यालय की स्वदेशी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किए जाने के आरोप लगे। सोशल मीडिया पर दावा किया गया कि संबंधित रोबोट पहले से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध कमर्शियल मॉडल है।हालांकि विश्वविद्यालय की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आना बाकी है, लेकिन इस विवाद ने संस्थान की छवि पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिक्षा क्षेत्र में वर्षों से स्थापित ब्रांड के लिए यह विवाद महत्वपूर्ण है। यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है तो पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है। वहीं, यदि संस्थान स्पष्टीकरण देकर स्थिति स्पष्ट करता है तो मामला शांत हो सकता है।फिलहाल गलगोटिया यूनिवर्सिटी का नाम शिक्षा जगत के साथ-साथ टेक्नोलॉजी बहस में भी चर्चा का विषय बना हुआ है।





