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Thursday, February 19, 2026

छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती विशेष: स्वराज, साहस और स्वाभिमान के अमर प्रतीक

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उपकार मणि ‘उपकार’
19 फरवरी भारतीय इतिहास की वह गौरवपूर्ण तिथि है, जब 1630 में महाराष्ट्र के शिवनेरी दुर्ग में एक ऐसे बालक का जन्म हुआ, जिसने आगे चलकर हिंदवी स्वराज की नींव रखी। वह बालक थे—छत्रपति शिवाजी महाराज। उनका जीवन केवल तलवार की धार तक सीमित नहीं था, बल्कि वह सुशासन, दूरदर्शिता, कूटनीति और जनकल्याण का आदर्श उदाहरण था।
शिवाजी महाराज की माता जिजाबाई ने उनमें राष्ट्रप्रेम और धर्मनिष्ठा के संस्कार डाले। गुरु दादाजी कोंडदेव के मार्गदर्शन में उन्होंने युद्धकला और प्रशासन की शिक्षा प्राप्त की। किशोरावस्था में ही उन्होंने तोरणा और रायगढ़ जैसे किलों पर अधिकार कर अपने स्वराज अभियान की शुरुआत की।
शिवाजी महाराज ने ‘गनिमी कावा’ (छापामार युद्ध नीति) के माध्यम से शक्तिशाली मुगल और आदिलशाही सेनाओं को पराजित किया। उनका युद्ध कौशल अद्वितीय था। उन्होंने विशाल सेना की बजाय चुस्त और प्रशिक्षित सैनिकों की टुकड़ियों पर बल दिया।
1674 में रायगढ़ किले पर उनका भव्य राज्याभिषेक हुआ और वे “छत्रपति” की उपाधि से अलंकृत हुए। यह केवल एक राजा का राज्याभिषेक नहीं था, बल्कि स्वाभिमान और स्वतंत्रता की घोषणा थी।
शिवाजी महाराज ने अष्टप्रधान मंत्रिमंडल की स्थापना की और प्रशासन को संगठित रूप दिया। उन्होंने किसानों, महिलाओं और आम जनता की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
महिलाओं के सम्मान की रक्षा उनके शासन की विशेष पहचान थी।
धार्मिक सहिष्णुता उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी; उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार दिए।
नौसेना की स्थापना कर समुद्री सुरक्षा को मजबूत किया।
आज के दौर में शिवाजी महाराज का जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने संगठन, रणनीति और आत्मविश्वास के बल पर इतिहास रचा।
उनका संदेश स्पष्ट था—
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।”
देशभर में 19 फरवरी को शिवाजी जयंती उत्साहपूर्वक मनाई जाती है। विद्यालयों, सामाजिक संगठनों और प्रशासनिक संस्थाओं में उनके चित्र पर माल्यार्पण कर उनके आदर्शों को स्मरण किया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण के लिए साहस, ईमानदारी और समर्पण अनिवार्य है।
छत्रपति शिवाजी महाराज केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे भारत के आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की जीवंत मिसाल हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि दृढ़ संकल्प, संगठन शक्ति और राष्ट्रप्रेम से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
उनकी जयंती पर यही संकल्प लें कि हम उनके आदर्शों पर चलकर समाज और राष्ट्र को सशक्त बनाने में अपनी भूमिका निभाएँगे।

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